236/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
भगवानों को
जीवंत भगवान नहीं
पत्थर की मूर्तियाँ
समझते हैं,
इसीलिए तो
उनके चरणों के दास
बैठकर उनके
चरणों में
भेंट के नोटों को
अपनी जेबों में
अंटियों में उड़सते हैं।
राम आ गए,
उनकी कुटिया के
भाग खुल गए,
वे कुटिया को छोड़
महलों में रम गए,
राम की ही आँखों में
धूल झोंकते रहे
और उधर राम
मौन बने हुए
पत्थर बने खड़े रहे।
दूध का दूध
पानी का पानी
कैसे हो,
चिंतनीय है
सोचनीय है,
निंदनीय है,
पर क्या और कैसे?
सदियां बीत जाएंगी ऐसे!
चम्पतियों की चपतें
कब तक
चंपी करेंगीं!
और जलती हुई आग को
राख में दबाती रहेंगीं !
व्यवस्था की
दुरावस्था अंततः
कब तक
भगवानों को
चूना लगाएगी!
भक्तों की भक्ति को
भुनाया जाता रहेगा ।
जब तक सियासत
मंदिरों में घुसी रहेगी,
चोरों की चाँदी
चमकती रहेगी,
सियासत की छाँव तले
मंदिरों के भगवानों को
यों ही ठगा जाता रहा है,
ठगा जाता ही रहेगा,
चोर चोर जीजा सालों का
चाचा भतीजों का
चौर्य कर्म जिंदा रहेगा।
खून ही जिसका
दूषित हो,
उस आदमी से
भगवान को
उम्मीद करना भी क्या!
लोभ-लालच के हाथों में
भगवानों का
रहना भी क्या ?
वे नहीं मानते
कि राम देख रहे हैं,
और वे उनके ही सामने
डाका डाल रहे हैं!
बेशर्मी की पराकाष्ठा की
सीमा अनन्त है,
पीले कपड़ों में
तिलक छापधारी आदमी
यहाँ 'महा संत' है।
शुभमस्तु,
17.07.2026◆1.45 आ०मा०
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