गुरुवार, 23 जुलाई 2026

झूम -झूम मँडरा रहे [ सजल ]

 238/2026


    

समांत           : आस

पदांत            : अपदांत

मात्रभार         :24.

मात्रा पतन      :शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मधुकर के मन में बसी,पाटल मधुर सुवास।

झूम-झूम मँडरा रहे,खिली कली के पास।।


तितली  भँवरे से कहे, चलो चलें उस ओर।

कोयल करती काग से,बगिया में परिहास।।


कोयल - कागा   से  नहीं,  लेना-देना   एक।

और नहीं   सम्बंध  भी,उनसे अपना खास।।


सब अपनी रुचि से करें,अपने काम अनेक।

टाँग फटे में क्यों अड़ा,हमको करनी आस।।


सबके सूरज-चाँद का,अलग-अलग है तेज।

जुगनू निकले रात में,सीमित सफल उजास।।


नेताजी  नित   चाभते,  काजू   या अखरोट।

गाय  भैंस  बकरी सभी, चबा  रहे बस घास।।


'शुभम्' तुम्हारी   राह हैं,अलग-अलग अभिप्रेत।

अलग -अलग जीते सभी,अलग मिले हैं श्वास।। 


शुभमस्तु,


20.07.2026◆6.30 आ०मा०

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