गुरुवार, 23 जुलाई 2026

कॉकरोच [ दोहा ]

 241/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दूषण   का  उत्पाद हैं,  कॉकरोच के झुंड।

रेंगें   शुद्धाहार  में, चमकाते    निज  मुंड।।

कॉकरोच बढ़तेतभी,जब हो रुग्ण समाज।

रहें   उपेक्षित   वे सदा,बनें कोढ़ में खाज।।


नहीं जरूरत देश को , कॉकरोच की आज।

बढ़ते स्वच्छ समाज में, करें अहं पर नाज।।

कॉकरोच   सुनते   नहीं,झूठ   बनाते बात।

कहते बस   उनकी सुनो,करें  अन्यथा घात।।


कब-कब शासन में रहे,कॉकरोच मतिहीन।

दूषण   पर जो पल रहे,सदा -सदा से दीन।।

जंतर -मंतर   रोड    पर,संसद   पर है ढेर।

कॉकरोच   बढ़वार  का,कहते  हैं हम शेर।।


किटकिन्ना    आता   नहीं,संविधान का लेश।

कॉकरोच   चिल्ला   रहे, बढ़ा   शीश के केश।।

बहकावे   में   आ   गए,  कॉकरोच   के झुंड।

अमराई    में     रेंगते,   पालित काकभुशुंड।।


कॉकरोच   शासन    करें, तब   हो बंटाढार।

नियम नीति कानून का, नहीं  जहाँ आधार।।

नाले-नाली   में बना, जिनका   मूल निवास।

कॉकरोच   वे   चाहते, संसद   में लें श्वास।।


कॉकरोच   जन  पार्टी, वर्षा का उत्पाद।

कूकरमुत्ते   उग  रहे, चाहत लेना स्वाद।।


शुभमस्तु,


22.07.2026◆2.00 प०मा०

                    ◆●◆

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...