242/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
देखकर घोड़े को
ठुकवाते हुए नाल
मेढकी ने भी सोचा
मैं भी ठुकवा लूँ,
अपनी टाँगों को
और भी मजबूत बना लूँ।
बैठ गई वह भी
ठुकवाने नाल,
पहली ही चोट में
बिगड़ गया हाल,
क्या करती बेचारी
टाँगें फैलाईं और
चारों खाने चित्त!
यही हाल है
कॉकरोचों का,
चौबे जी छब्बे जी
बनने गए थे
दुब्बे जी बनकर चले आए,
क्या करते बेचारे
बहुत -बहुत पछताए!
बढ़ गया जब
बहुत सारा प्रदूषण,
कॉकरोच पनपने लगे,
संसद की कुर्सी के हित
लार टपकाने लगे,
गंदगी से उगे कीटों का
यही हस्र होता है,
हुआ भी वही।
होती है जब बरसात
उगते ही हैं कुकुरमुत्ते,
देखते नहीं रस्ते कुरस्ते
फिर क्या भेड़चाल में
निकल पड़ते हैं,
जंतर मंतर पर
ढूंकने लगते हैं,
सियासत का नया- नया
स्वाद चखने के वास्ते।
देश की समस्याएँ
कीड़े-मकोड़ों का खेल नहीं,
पीं- पीं करती
बच्चों की रेल नहीं
ठीक है लोकतंत्र
बहुमत का
परिणाम है,
लेकिन इतना भी
सस्ता नहीं की
गीदड़ गङ्गा पार उतर जाए!
शुभमस्तु,
22.07.2026◆2.30प०मा०
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