084/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
आ जाती हैं
कैसी- कैसी
जीवन में मजबूरियाँ।
पास न
माता-पिता बहन भी
गोद धरा की सो जाना
लगा
ईंट पत्थर का तकिया
नव सपनों में खो जाना
बने विषम
हालात रही क्यों
निज पालक से दूरियाँ।
जीवन में
क्या -क्या होना है
कौन जानता भावी को
वक्त दिखाए
दिन ये कैसे
ताला बंद न चाबी को
इस वीरान
धरा पर कोई
उसे सुनाए लोरियाँ।
मैले वस्त्र
देह पर धारे
फटी चप्पलें पैरों में
आ जाती है
देख दशा ये
दया हृदय में गैरों में
नहीं मुलायम
गद्दे बिस्तर
नहीं फटी भी बोरियाँ।
शुभमस्तु,
10.02.2026◆ 6.00आ०मा०
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