मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

जीवन में मजबूरियाँ [ गीत ]

 084/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आ जाती हैं

कैसी- कैसी

जीवन में मजबूरियाँ।


पास न

माता-पिता बहन भी

गोद धरा की सो जाना

लगा

ईंट पत्थर का तकिया

नव सपनों में खो जाना

बने  विषम

हालात रही क्यों

निज पालक से दूरियाँ।


जीवन में

क्या -क्या होना है

कौन जानता भावी को

वक्त दिखाए

दिन ये कैसे

ताला बंद न चाबी को

इस वीरान

धरा पर कोई 

उसे सुनाए लोरियाँ।


मैले वस्त्र

देह पर धारे

फटी चप्पलें पैरों में

आ जाती है

देख दशा ये

दया हृदय में गैरों में

नहीं मुलायम 

गद्दे बिस्तर

नहीं फटी भी बोरियाँ।


शुभमस्तु,


10.02.2026◆ 6.00आ०मा०

                  ◆◆◆

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