085/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
कोयल कुहू- कुहू कर बोली।
उठो बालको आई होली।।
फूल खिले हैं क्यारी -क्यारी।
रंग-बिरंगी है तैयारी।।
गेंदा और गुलाब महकते।
जिन पर तितली भ्रमर चहकते।।
जंगल- जंगल दहकन कैसी।
आग लगी हो वन में ऐसी।।
टेसू लाल-लाल हैं फूले।
कीट - पतंगे डालें झूले।।
सरर-सरर बह रहीं हवाएँ।
भरी गलन में धूप तपाए।।
'शुभम्' लगे वसंत ऋतु आई।
चलती शीतल सद पुरवाई।।
शुभमस्तु,
10.02.2026◆6.45आ०मा०
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