शुक्रवार, 4 जनवरी 2019

अपने -अपने सच [अतुकान्तिका]

अपने -अपने सच , 
सच में 
सच नहीं हैं,
पर वे कहते हैं-
वे सही हैं,
वे ही सही हैं।

ये सच नहीं
अपनी -अपनी हठ है,
सभी महाज्ञानी 
न कोई कहीं सठ है,
दूसरों की खिड़कियों में
झाँकने का चपल प्रयास,
अपने गरेबाँ झाँकने की
नहीं है आस।

वे चलते रहते हैं दिन रात
पर पहुँचते कहीं नहीं,
बस कीचड़ -उछाल 
प्रतियोगिता हो रही,
कौन किसके दामन को
कर सकता है  गंदा,
पर दूध से धोया 
नहीं है कोई बंदा।

कीचड़ उछालते-उछालते 
बीत जाते हैं पाँच वर्ष,
अच्छे दिन आने की
आशाएँ तुषारावृत,
सपने भी होते जा रहे
मृत ,
देखते - उलझते हुए  
आँकड़ों के वृत्त।

इतनी भी नासमझ
नहीं है ये जनता,
पलट देती है
एक ही झटके में तख्ता,
आत्म निरीक्षण आज नहीं
कल करेंगे,
जब सुनामी के कहर में
सपने  ढहेंगे।

अपनी अंतरात्मा की 
मौन आवाज,
जतला रही 
भविष्य का अंतर्नाद,
किस खुमारी में 
सोए हुए हैं,
बीज वही तो उगेंगे
जो तुमने बोए हुए हैं,
ये मत समझ लेना 
कि लोग सोए हुए हैं।

काश आम आदमी
पिसते हुए मध्यम वर्ग
कौन दे पाया है स्वर्ग,
इनकी धुकधुकी पर
अगर ध्यान हो जाए,
तो इस देश का
जनता जनार्दन का 
हर कल्याण हो जाए,
किन्तु यदि हो गया 
देश का "शुभम" कल्याण,
तो कौन पूछेगा सियासत को
और चिल्लाएगा-
त्राहि माम्!
त्राहि माम्!!
त्राहि माम्!!!

💐 शुभमस्तु  !
✍🏼रचयिता ©
🌱 डॉ. भगवत स्वरूप "शुभम"

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