सोमवार, 31 अगस्त 2026

माटी के चूल्हे की बात [ गीत ]

 274/2026


        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बीते हुए

दिनों की यादें

माटी के चूल्हे की बात।


भुला नहीं पाए

हम अब भी

गर्म -गर्म रोटी का स्वाद

कढ़ी

खरी रोटियाँ सिंकी वे

आती है रह-रहकर याद

लकड़ी सुलग रही

दे लपटें

लाल-लाल चिनगी बरसात।


चूल्हे के ढिंग

बैठ पूस में

हाथ-पाँव हम सेंक रहे

चुपड़ी रोटी

स्वाद ले रहे

घोल अपूपी   फेंट   रहे

बोरी बिछा

पालथी मारे

करते भोजन प्रातः- रात।


गोबर के 

उपले जब सुलगें

चट-चट लकड़ी चटके आँच

नहीं एक-दो

मन से खाते

रोटी सात -सात या पाँच

आलू भून 

बनाएँ भुर्ता

सिंकता जाए शीतल गात।


शुभमस्तु,


25.08.2026◆ 5.30 आ०मा०

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