274/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
बीते हुए
दिनों की यादें
माटी के चूल्हे की बात।
भुला नहीं पाए
हम अब भी
गर्म -गर्म रोटी का स्वाद
कढ़ी
खरी रोटियाँ सिंकी वे
आती है रह-रहकर याद
लकड़ी सुलग रही
दे लपटें
लाल-लाल चिनगी बरसात।
चूल्हे के ढिंग
बैठ पूस में
हाथ-पाँव हम सेंक रहे
चुपड़ी रोटी
स्वाद ले रहे
घोल अपूपी फेंट रहे
बोरी बिछा
पालथी मारे
करते भोजन प्रातः- रात।
गोबर के
उपले जब सुलगें
चट-चट लकड़ी चटके आँच
नहीं एक-दो
मन से खाते
रोटी सात -सात या पाँच
आलू भून
बनाएँ भुर्ता
सिंकता जाए शीतल गात।
शुभमस्तु,
25.08.2026◆ 5.30 आ०मा०
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