275/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
संस्कृति पर ही खतरा है
तो संस्कृत बचे कैसे,
दीमक लग गया है जड़ों में
देश खोखला हो रहा है
दिन -रात।
सौगन्ध उठा रखी है जिसने
देश को बरबाद करने की
सभी जानते हैं उसे
कॉकरोचों का सरदार वही।
देश का दुर्भाग्य यही
लोग आँखों पर
पट्टियां बाँधे चल रहे
उसके पीछे-पीछे
अपने हिए की भी मींचे।
कुकुरमुत्ते उग आए हैं
विदेशी यहाँ पेड़ों पर
उन्हें समूचा कुचलना ही है
ऐ भारतीयो ! जाग जाओ
सामर्थ्य वह जटाओ
कि सपोलों को मिटा पाओ।
आग लगी है चारों ओर
विरोध के लिए
विरोध करना है,
उनके बाप का
जाता ही क्या है?
यहीं का खाना है
यहीं पर पलना है
और यही पर मरना है,
पर तिरंगे के नाम पर
बेड़ा यहीं का गर्क करना है।
हम सभी जागें
सपोलें कुचलें,
वे भागें ,
आस्तीन से निकालें
नहीं अनुरागें,
चौंसठ घड़ी
इन्हें त्यागें,
तभी देश बचेगा,
पहले देश
और सब कुछ बाद में।
शुभमस्तु,
28.08.2026 ◆7.00 आ०मा०
◆●◆
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें