शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

आदमी हैं हम भी! [अतुकान्तिका]

आदमी हैं हम भी!
पर आदमी समझा नहीं जाता
वही हाड़ - माँस है,
आती और जाती हुई
तुम्हारी ही तरह साँस है,
फिर भी हमारे नाम से
आती आदमी को बास है,
हमारी धमनियों में भी
बहता वही रक्त है,
फिर आदमी समाज का
हमसे क्यों विरक्त है?


हमारा भी घर है 
परिवार है,
तुम्हारी तरह 
हमारा भी संसार है,
रिश्ते और नाते हैं,
यथासंभव  हम 
उन्हें निभाते हैं,
पर तुम्हें हम तो
एकदम नहीं भाते हैं,
हमारे नाममात्र से
हमारी शक्ल -सूरत से
लोग डरजाते हैं, 
शंका से घिर जाते हैं,
कोई भी क्यों हमें
ठीक से समझ नहीं पाता,
आदमी हैं हम भी
पर आदमी समझा
 नहीं जाता।

हमारी वर्दी के नीचे भी
एक दिल धड़कता है,
और लोग कहते हैं
कि तू बहुत अकड़ता है!
हमारी भी अपनी
एक निर्धारित ड्यूटी है,
उस कठोर ड्यूटी की
अपनी ही अलग ब्यूटी है,
हमारे भी हैं कुछ
बन्धन अनुबन्धन,
जिन्हें कीचड़ कहो
या कह लो चन्दन,
कभी सीधी नज़र से
हमें देखा नहीं जाता,
देखकर हमारी वर्दी
चोर डाकू भी सहम जाता,
आदमी हैं हम भी !
पर आदमी समझा
 नहीं जाता।

हमारे काम को
किसने समझा है , जाना है,
सभी ने हमें दोयम दर्जे का
इंसान समझा है, माना है,
सड़क-दुर्घटना में
इधर -उधर बिखरे हुए 
रक्त -माँस को,
आग से जली 
पंखे से लटक रही लाश को,
किसने उठाया है 
अपने इन्हीं हाथों से ,
तुम्हें तो फ़ुर्सत नहीं 
व्यर्थ की बातों से,
है किसी में इतना साहस,
कि छू भी सके 
दूर है उतना उसको,
जीते जी करते थे
प्यार दुलार लाड़ भी जिसको,
क्या उठा सकेंगे
स्वजन के भंग अंगों को,
इन्हीं हाथों से 
हमें भी खानी है रोटी,
जिनसे उठानी पड़ती है
आदमी की हमें बोटी,
वहाँ हर आदमी का 
मर्म कहाँ चला जाता,
हमें हमारे ही
हाथों  छला जाता,
आदमी हैं हम भी!
पर आदमी समझा 
नहीं जाता।

बैठ कर चौके में चौपाल पर
हम पर चुटकियाँ कसना,
आसान है तुम्हारे लिए
हम पर हँसना,
रातों -रात खड़े-खड़े
एक पैर पर तपस्या करते,
दो घड़ी विश्राम करने
एक स्टूल को तरसते,
किसी ने पूछा है कभी
कि तुम जीते-मरते ,
तुम्हें भी याद करते 
कभी  घर के,
कब चले जाना होगा
हमें अपनी ड्यूटी पर,
छोड़ देना होगा 
खाट टूटी क्वार्टर,
चैन की नींद सुलाकर तुम्हें
अँधेरी सडकों गलियों में,
खोए हुए होंगे तुम तो
अपनी रंगरलियों में,
सुना ही होगा 
रात के सन्नाटे में 
खटकता डंडा,
कोई नहीं है इतना
बहरा अंधा,
हमारी वेदना को
क्यों कोई समझ नहीं पाता,
आदमी हैं हम भी!
पर आदमी समझा 
 नहीं जाता।

पत्नी बीमार है 
बच्चे को चोट आई है,
नहीं सुनता अधिकारी हमारी
नहीं छुट्टी मिल पाई है,
इमरजेंसी है
कभी कोई इलेक्शन है,
आ रहे हैं कभी मन्त्री जी
कभी ईद होली है फंक्शन है,
बुलावा हमारा ही 
सबसे पहले होता ,
हमारी भी मजबूरी को
कोई काश ! समझा होता ?
साले की लड़की की
शादी है,
पर नहीं जाओगे,
चले भी जाओ 
तो सुबह तक लौट आओगे?
 न विवाह न मुंडन 
न कोई दीवाली होली,
अपनी तो लगती है
चौराहे पर ही चन्दन रोली,
लोग करते हैं मज़े से
रस ले लेकर के ठिठोली,
पर जीवन के आनन्द से
खाली सदा अपनी झोली,
पुलिस वालों को कोई
भी समझ नहीं पाता,
आदमी हैं हम भी!
पर आदमी समझा
 नहीं जाता।।

शुभमस्तु!
✍रचयिता ©
 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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