गुरुवार, 24 अक्तूबर 2019

ट्रेन -बर्थ हमारी बपौती है [ व्यंग्य ]

                             यद्यपि  हम चाँद -  मंगल   और शुक्र की बात करते हैं, हमारी पहुँच में अब चन्द्रमा पर बस्तियाँ बसाना हमारा सुनहरा सपना है, किन्तु हम शौचालयों में बैठने का सहूर अभी तक नहीं सीख पाए हैं और भारतीय ट्रेनों के में तो एकदम नहीं।

                         हमारी भारत सरकार इस बावत बहुत प्रयत्नशील है कि हम अपनी मैदानी खुली  आदत छोड़कर  बन्द   कोठरी  में बैठने  का सहूर  सीख लें।   पर  ' हम नहीं सुधरेंगे ' - वाली  कहावत है।
 आज ट्रेन के शौचालयों में बिना  शौच-कूप देखे भाले ऊपर सीट पर ही शौच कर लेते हैं। इतनी जल्दी तो एक नादान बच्चा भी सीख जाता है। पर हम तो कसम खाकर बैठे हैं ,कि चाहे कितने शौच-कूप बनवा लो , हम तो खुले हैं तो खुलकर ही करने के अभ्यासी हैं , संस्कारी हैं। भला हमारा संस्कार कहाँ चला जायेगा। यद्यपि देश में रेलें चलाकर आंग्रेज़ों ने भी बहुत कोशिश की कि हम कुछ सभ्य हो जाएं , पर काली कमली पर चढ़े न दूजा रंग, क्या किया जाए?

                  जब भारतीय रेल और उनमें होने वाले खेल की बात चली है ,तो यहाँ प्रसंगवश यह चर्चा भी कर ली जाए कि रेल की संपत्ति हमारी अपनी है। जगह -जगह स्टेशनों औऱ ट्रेनों में यह लिखा भी रहता है: कि रेल आपकी सम्पत्ति है। जब यह हमारी सम्पति है तभी तो हम इसके शीशे , पंखे , बल्ब , ट्यूब लाईट, सिग्नलों की घिर्रियाँ घर पर खोल लाते हैं , जिससे हमारे बच्चे खेल सकें और अपनी ही रेल - संपत्ति का लाभ हम घर भीतर तक उठा सकें।

            जब हम ट्रेन की बर्थ पर आसीन हो जाते हैं तो वह हमारी औऱ हमारे बाप की हो जाती है और शादीशुदा महिलाओं के लिए शादी हो जाने के कारण हमारे करवाचौथिय पति (ऐसा पति जिसके लिए करवा चौथ का व्रत रखा जाता है) की हो जाती है। अर्थात सर्वाधिकार सुरक्षित , पूर्ण कब्जा । कोई माई का लाल या लाली आ जाए , बैठने नहीं देंगे।वह हमारी निजी स्थायी सम्पति जो है। खाली पड़ी है तो क्या ? है तो हमारी, हमारे नाम की, हमारे नाम से, हमारे नाम पर आवंटित। रेलवे के रूल गए भारतीय तेल लेने। रात के नौ बजे तक कोई अन्य सवारी दिन में उन सीटों पर बैठ सकती है। पर इससे क्या? वह हमारे नाम पर बुक है।इसलिए उस पर पिड़कुलिया की तरह पंख फैलाकर बैठने , घर की तरह टाँगें फैलाकर पसरने , अपनी अटैची , बोरिया -बिस्तर सीट पर रखने , का पूरा बैनामा है हमारे नाम। तुम्हें जगह नहीं है तो जाओ करो रेलवे से शिकायत ! हम अपनी सीट पर आपके नितम्ब का 1/68 भाग में नहीं रखने देंगे।खड़े रहो हमारी बला से ईसा मसीह बने हुए। हमारी निजी चीज़ पर आपका क्या, किसी का भी कोई हक दूर -दूर तक नहीं हो सकता।

             हम भारतीयों की समाज -सेवा की स्थिति यदि जाननी हो , तो सेकिंड क्लास डिब्बे में यात्रा करके देख लीजिए। पूरे भारत का नज़ारा ट्रेन में यात्रा करके किया जा सकता है। बाहर का नज़ारा तो स्वतः होता ही है ,अंदर के नजारे से हमें दिखने लगता है कि देश के लोग कितने बड़े देशभक्त औऱ समजप्रेमी हैं। यहाँ सियासत से लेकर गली, मोहल्ला , सड़क , बाजार, सास , बहू, ऑफिस , ऑफिसर, कार्यालय , कर्मचारी, साधु , सन्यासी , ब्रह्मचारी सबकी चर्चा आम होती है। पर सीट देने के नाम पर मुर्गे के चूजे की तरह हम ऐसे पंख फुलाने की कला में भी इतने माहिर हैं कि जहाँ पाँच लोग बैठते हैं , वहाँ हम अपनी बीबी बच्चों के साथ तीन भी उस पर नहीं समाते । किसी सवारी के उतरते ही उस पर ऐसे कब्जा कर लेते हैं कि जैसे ट्रेन तो इनके अब्बा ने ही चलाई है।आँखें बंद करते हुए ऐसे लेट जाएंगे कि कि कितनी गहरी नींद में हैं। बीवी कहेगी बीमार हैं , इसलिए सो रहे हैं। और कुछ नहीं तो छोटे बच्चों से कुछ ऐसा रायता फ़ेलवा देंगे कि कोई सोचेगा भी नहीं , वहाँ बैठने की। पानी,दवा, मल, मूत्र करवा के अपने पूर्ण आधिपत्य का कोई नया तरीका नहीं है। इस देश के आम भारतीय से इतनी ही उम्मीद की जा सकती है। इसी प्रकार के हम भारतीय सम्मानित रूप से समाज में झंडे बैनर लेकर अखबारों में छपते हुए रोज देखे जा सकते हैं। भारतीय रेलों में हम भारतीयों का केंचुल रहित नग्न स्वरूप देखा जा सकता है। चूँकि रेल हमारी निजी सम्पति है , इसलिए हम निजी तौर तरीकों से रेल यात्रा का आनन्द उठाते हैं। किसी औऱ से हमें क्या लेना देना? पूरे देश और समाज का हमने कोई ठेका थोड़े ही ले रखा है। यहाँ सारे मुखौटे उतर जाते हैं। ये है भारतीय रेल का खेल। न कहीं ताल न कोई मेल।। मेल हो चाहे फीमेल, सभी की आपाधापी रेलपेल। 
💐शुभमस्तु !
 ✍लेखक ©
 🚟 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'


         

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