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डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
धरती पर अभिशाप हैं,कतिपय मानव देह।
कर्महीन रहते यहाँ, उन्हें न जन से नेह।।1
वाणी में अमृत बसा, वाणी विष की खान।
वाणी ही अभिशाप है, वाणी से सम्मान।।2
मात-पिता को जानते, जो नर केवल भार।
संतति वे अभिशाप हैं,सदा रहें अनुदार।।3
देशद्रोह कर भर रहे, जो जन अपना पेट।
धरती के अभिशाप हैं,लीन सदा आखेट।।4
जिसका खाते अन्न हम,उससे करें न पाप।
धन्य मात भू भारती,बनें न जन अभिशाप।।5
छल-छ्द्मों में लिप्त है, गुरुवर से कर द्वेष।
अर्जित कर अभिशाप को,क्षम्य न एक निमेष।।6
कर्म पुण्य है पाप भी,वही बने अभिशाप।
कर्मों से ही दूर हों, मानवीय हर ताप।।7
हर संतति माँ-बाप को, हो न सदा वरदान।
बनती है अभिशाप भी, प्रतिशोधक इंसान।।8
आगे-आगे चल रहे, कर्म तुम्हारे बंधु।
वही पुण्य अभिशाप भी,वही मधुर जल सिंधु।।9
ईश्वर का वरदान है, कवि होना सौभाग्य।
कुछ भोगें अभिशाप भी, कुछ धरते वैराग्य।।10
'शुभम्' कर्म के खेत में, लगते फल निष्पाप।
सुखद जिएं जीवन वही, रहें नहीं अभिशाप।।11
शुभमस्तु,
08.10.2026◆8.30 आ०मा०
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