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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
घूम रहे कुछ जंतु घुमंतू।
करते किंतु परंतु घुमंतू।।
अपने पर विश्वास नहीं है।
जो भी कह दें वही सही है।।
उलझे - से वे तंतु घुमंतू।
घूम रहे कुछ जंतु घुमंतू।।
नहीं देश को अपना मानें।
सिर्फ़ सपोलों को पहचानें।।
मानें खुद को कंतु घुमंतू।
घूम रहे कुछ जंतु घुमंतू।।
बिल ही जिनकी एकल सीमा।
समझ रहे भारत का बीमा।।
मानव तन में अंतु घुमंतू।
घूम रहे कुछ जंतु घुमंतू।।
उन्हें न कोई अपना प्यारा।
लिए बपौती देश हमारा।।
तन - मन के वे हन्तु घुमंतू।
घूम रहे कुछ जंतु घुमंतू।।
नहीं एक भी शेष भलाई।
हिंदू मुस्लिम सिक्ख इसाई।।
सदा चाहते मंतु घुमंतू।
घूम रहे कुछ जंतु घुमंतू।।
कंतु =कामदेव
अंतु= कीड़े -मकोड़े
हन्तु = जान से मारने की इच्छा रखने वाले
मंतु =अन्याय ,अपराध।
शुभमस्तु,
07.102.026◆1.00 प०मा०
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