बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

बंदरों जैसी भी हरक़त देख ली [ गीतिका ]

 340/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्


बंदरों    जैसी   भी   हरक़त देख ली।

उष्ट्र   जैसी   भी   करवट   देख  ली।।


आदमी     की     देह  में    वानर  लगे।

इस बाग के तरु   बेल   क्या  तेरे सगे??

तुझको मिली हमने वो बरकत देख ली।

बंदरों   जैसी  भी    हरक़त    देख ली।।


लड़ते  हुए   तकदीर   से  देखा तुझे।

पर नहीं  मंज़िल   कहीं    दीखा मुझे।।

साँप   जैसी   भी   हसरत   देख ली।

बंदरों   जैसी   भी  हरक़त   देख ली।।


मियाँ    मिट्ठू   भी  सौ    का  एक   तू।

चाहता   है   पेय   में  हो    सिर्फ़  खूँ।।

सिरफिरी   तेरी   वो   जुर्रत  देख ली।।

बंदरों  जैसी  भी   हरक़त   देख   ली।।


साँप को   बस   साँप  ही   अच्छे लगे।

और   तो   सब   भेक   के   बच्चे  सगे।।

तालाब में    टर  टर्र    टर्रत    देख ली।

बंदरों    जैसी    भी    हरक़त   देख  ली।।


समझता  है  तू  खिलाड़ी   एक  ही।

खींचता  तू    सिर्फ़   गाड़ी  देश की।।

जोड़ने   की  वह मशक्कत  देख ली।

बंदरों   जैसी   भी हरक़त   देख ली।।


शुभमस्तु,


07.10.2026 ◆2.15प०मा०

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