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[आहट,संदेश,ऋतुपति,गुनगुन,धूप]
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सब में एक
शरद आगमन हो रहा, आहट सुनते कान।
बढ़े शीत का कारवाँ, नगर गाँव सुनसान।।
रजनी भादों क्वार की,करे तिया अभिसार।
आहट भी होती नहीं, पायल की झनकार।।
श्राद्ध पक्ष अब जा रहा, दिया शुभद संदेश।
नवदुर्गा में देवियाँ, पूजित कन्या वेश।।
शुभद नहीं संदेश ये, विकृत युवा समाज।
खंडित करती देश को,कॉकरोच की खाज।।
चैत्र और वैशाख में , ऋतुपति करें धमाल।
डाल -डाल है नाचती, फूलें फूल सँभाल।।
ऋतुपति आए सृष्टि में,मची धूम चहुँ ओर।
कुंज-कुंज कोकिल रमी,नाच रहे वन मोर।।
गुनगुन धूप सुहावनी, शीतकाल सुख साज।
सुख देती जन जंतु को, आँगन रही विराज।।
गुनगुन ऊनी वस्त्र का,सुखद सौम्य अहसास।
शीतलता तन की हरे, करता नवल उजास।।
दिनकर बिना न धूप है,भरा उजाला कोष।
सद्गुण का भंडार है, एक नहीं है दोष।।
धूप बत्तियाँ जल रहीं,महक उठी चहुँ ओर।
मंदिर में घंटे बजे, चहक उठी है भोर।।
एक में सब
गुनगुन धूप सुहावनी, ऋतुपति का संदेश।
पिक आहट होने लगी, प्रमुदित रमा-रमेश।।
शुभमस्तु,
07.10.2026◆5.30 आ०मा०
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