गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

कुसुमित कलियाँ बाग में [ कुंडलिया ]

 343/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                          -1-

कुसुमित कलियाँ बाग में, बगराईं  चहुँ ओर।

डाल-डाल  है  झूमती, प्रमुदित संध्या  भोर।।

प्रमुदित संध्या  भोर,सुरभि प्रसरित मनभाई।

नृत्य   करें  वन  मोर,  नयन  में  भरी लुनाई।।

'शुभम्' पखेरू-गान,नीड़ में होता विलसित।

करें  शरद सम्मान, बाग में कलियाँ कुसुमित।।


                         -2-

लगते    आश्विन    मास  के, बदल गया परिवेश।

अंबर   में    बादल   नहीं,  अलग   मिले संदेश।।

अलग     मिले      संदेश,  धूप   में  तेजी आई।

हुआ     शीत      संचार,   नहीं   चलती पुरवाई।।

'शुभम्' खिले नर-नारि,हरित कुसुमित तरु खिलते।

सीताफल     अमरूद,  आँवला    शोभन लगते।।


                          -3-

कुसुमित उर कलिका वही,अब तक  थी  बेजार।

तेज  तपन  घटने   लगी,मास  लगा शुभ क्वार।।

मास   लगा    शुभ   क्वार,  पूजते   दुर्गा माता।

भक्ति  भाव   में डूब,  भक्त  जन माँ को ध्याता।।

'शुभम्' भक्तिमय गीत, गूँजते जन-जन विहसित।

हरे   जवारे   दिव्य,  देव   आलय   में कुसुमित।।


                         -4-

कुसुमित मन कलिका करें, सजा हुआ दरबार।

माँ   दुर्गा   का   आगमन,   हुआ   हमारे द्वार।।

हुआ   हमारे   द्वार,   रूप धर  नव्य बालिका।

सिद्धिदातत्रिका  मातु, कभी वे मातु कालिका।।

'शुभम्' सृष्टि शृंगार, किया करतीं माँ सुरभित।

अग-जग   का  उद्धार, सर्वदात्री   से कुसुमित।।


                         -5-

माता   के  दरबार   में, कुसुमित पल्लव  फूल।

विनत भक्त का भाल है,करूँ न किंचित भूल।।

करूँ   न   किंचित भूल,सौम्यता मन में लाऊँ।

रहें    मातु    अनुकूल,पाँवड़े  पलक  बिछाऊँ।।

'शुभम्'   सदा   अनुराग,भाव से माँ को ध्याता।

कृपा   करें   नव रूप , मातु   के    गौरी माता।।


शुभमस्तु,


08.10.2026◆4.45 प०मा०

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