बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

सहनशील [ रोला ]

 335/2026


                


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

सहती    धरती     मात, अहर्निश  कोई    खोदे।

गर्त   कूप  तालाब,   कभी     पैरों     से   रौंदे।।

सहनशील माँ   नेक,  क्षमा   का   सागर  माते।

'शुभम्'  तुम्हारे   भक्त, तुम्हारे    ही   गुण गाते।


                         -2-

सहनशील   शुभ   भाव,  नहीं सब जन में होता।

उतावली   में  भूल, व्यक्ति  निज  सत पथ खोता।।

सोच   समझ  ले आज, नहीं   बन   तू अतिचारी।

'शुभम्'   प्रगति का मूल, जदपि  नर  हो या नारी।।


                         -3-

नारी   मानुष   जाति ,  नित्य   ही सहनशील है।

संतति रख निज कोख,अनोखी विमल झील है।।

मानव   का  कल्याण,   सदा    ही करती नारी।

सद्गुण  की  वह   खान,   किन्तु   सहती लाचारी।।


                         -4-

विकृत    है       आहार,   देश  में   बढ़ते रोगी।

दूषित आटा  दाल,  तेल    घी   के  जन भोगी।।

सहनशील शुभ  सत्त्व,  कहाँ  से उनमें  आए।

बढ़ा   जीभ   का    स्वाद, अंत  में  वे पछताए।।


                         -5-

सागर  उसका   नाम,   धैर्य  धर नित उमगाए।

हर   सरिता   का  नीर,  देह   में  सदा समाए।।

सहनशील   वह    एक,  नहीं  ऊपर इतराता

कर    मर्यादा  त्याग,  नहीं   किंचित इठलाता।।


शुभमस्तु,


06.10.2026◆10.00 प०मा०

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