332/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
धीरज धर्म धरा नित धरती।
निज कीली पर सदा विचरती।।
गर्त कूप की करें खुदाई।
धीरज तदपि धरे भू माई।।
धीरज सदा नम्रता लाता।
मानवता जन को सिखलाता।।
व्यग्र भाव जो जन ले आता।
धीरज उसमें नहीं समाता।।
जो अधीर जीवन में होता।
आजीवन वह निशिदिन रोता।।
विपदा में जो धीरज लाए।
सदा सफलता सुलभ कराए।।
पति को धीरज देती नारी।
वही बनाती गेह सुखारी।।
विपदा में तिय धीरज धरती।
सुख का साज सदा वह भरती।।
मेरे गुरुजन यही सिखाते।
विपदा में जो जन अकुलाते।।
धीरज उनके पास न आता।
बारंबार मनुज पछताता।।
मित्र-परीक्षा धीरज लेता।
परख -कसौटी पर कस देता।।
जो न मित्र का साथ निबाहे।
असफल रहे नित्य पछताए।।
धर्म नहीं जो धीरज लाए।
पतन-गर्त में उसे डुबाए।।
कभी न धीरज त्यागो भाई।
वही करे जन की अगुआई।।
शुभमस्तु,
05.10.2026● 7.30 आ०मा०
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