रविवार, 27 सितंबर 2026

मालूम है ये [ गीतिका ]

 309/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


खोजने में  वे लगे हैं छेद,  मालूम   है ये।

जानना इस राज का भी भेद,मालूम है ये।।


ख़ुद गिरें   वे   कूप    में,   या    आग  में,

दिल में  न उनके क्लेद,  मालूम    है  ये।


चैन    से   रहना    नहीं,    भाता    उन्हें,

खून में खड़िया घुली सफेद, मालूम है ये।


प्रेम  का   दुर्भिक्ष    ही,  लिखवा   लिया,

आठों    फहर     निर्वेद,   मालूम  है   ये।


क्या    कहा   कैसे  कहा , अज्ञात   सब,

सिर में   भरा    बस  मेद, मालूम  है   ये।


जो बना    जिसके   लिए,  करता   वही,

उनको नहीं कुछ  खेद, मालूम   है    ये।


नाव    डूबे      देश     की   चाहे  'शुभम्',

उनसे  नहीं      उम्मेद,   मालूम   है   ये।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆4.15 प०मा०

                  ◆●◆

मैंने छान मारा [ गीतिका ]

 308/2026


             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


तुझ-सा  नहीं  गुस्ताख़, मैंने छान मारा।

देखे   करोड़ों  लाख , मैंने   छान मारा।।  


खा रहा   जिस  थाल  में, आहार अपना,

करता   वहीं   सूराख, मैंने  छान मारा।


साँप बिच्छू   से    नहीं,  उम्मीद   कोई,

है  वत्स तू   वैशाख, मैंने  छान    मारा।


झोंपड़ी  की   छाँव  में,  नाटक  दिखाए,

खाता गपागप  दाख, मैंने    छान  मारा।


पंडित कभी मुल्ला कभी,क्रिस्तान भी तू,

तेरी  नहीं कुछ   साख, मैंने छान   मारा।


सबसे   बड़ी   कुर्सी तुझे, मिलनी नहीं है,

उम्मीद    तेरी    राख,   मैंने   छान मारा।


दुर्भाग्य   होगा    देश  का,पी एम हो तू,

देता 'शुभम्'  ये भाख, मैंने  छान   मारा।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆2.00प०मा०

               ◆●●

तू मत समझना [ गीतिका ]

 307/2026



           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बुद्ध   की   संतान  है, तू   मत समझना।

इस देश  का तू  मान है,तू मत समझना।।


संस्कृति नहीं है  सभ्यता,  तेरी यहाँ की,

तेरा न हमको ध्यान है, तू  मत समझना।


उगतीं  कँटीली  झाड़ियाँ  भी, जंगलों में,

हमको नहीं संज्ञान  है, तू मत समझना।


जोड़ता  जिस देश  को,  टूटा  नहीं   है,

योजक नहीं विषखान है,तू मत समझना।


आते  मिटाने  के लिए,  संतान   कुछ तो,

वंश  की   पहचान  है,  तू  मत समझना।


मूढ़ता    के   ढेर   में,    है     कूढ़ता  ही,

चलना  न तेरा प्लान है,तू  मत समझना।


देश की नजरें 'शुभम्' , तुझ पर टिकी हैं,

सठिया गया तू  ज्वान है,तू मत समझना।।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆12.30 प०मा०

                     ◆●◆

वे चाहते हैं [ गीतिका ]

 306/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हिंदोसितां   बरबाद   हो, वे  चाहते हैं।

दुश्मन कुटिल आज़ाद हो,वे चाहते हैं।।


लूटने   की     दास्तानें  ,  सब    पुरानी,

सुननी नहीं फरियाद हो,  वे  चाहते  हैं।


है   हलाहल  देह में , फन  भी  विषैला,

हर ओर केवल   गाद   हो, वे चाहते  हैं।


भाषणों   में   गालियाँ,  केवल उगलना,

जीभ   में   सुस्वाद  हो ,वे   चाहते   हैं।


रोना  कलपना  चीखना, उनको लुभाए,

आतंक  का आच्छाद  हो, वे चाहते हैं।


कर्म   खोटे   हैं,   रखा   क्या  नाम  तेरे,

बुद्धि   में    जल्लाद   हो, वे  चाहते  हैं।


समझें  नहीं केवल सपोले, साँप  हैं जो,

बढ़ता रहे    अवसाद  हो ,   वे चाहते हैं।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆11.45 आ०मा०

                ◆●◆

परम पिता परमात्मा [ दोहा ]

 305/2026


      

[भगवान,ईश्वर,प्रभु,विधाता,

परमात्मा ]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


              सब में एक

             

लीलाएँ प्रतिपल करें,अखिल सृष्टि भगवान।

मानव   यह  जाने  नहीं,व्यापक ईश महान।।

माया    ने भगवान  की, लुभा लिया संसार।

उनकी   इच्छा    से  चले,  सबका कारोबार।।



ईश्वर -महिमा   जानते, नहीं मनुज खग ढोर।

जलजीवी  जो  जंतु  हैं,उन्हें न मिलता छोर।।

ईश्वर   स्वामी   सृष्टि  के, वही नियंता आप।

उन्हें   नहीं   हैं    व्यापते,  शीतलता या ताप।।


प्रभु जी   से   विनती  यही,रखें  कृपा का हाथ।

जीव जिएं जीवन सभी, सुख से मिलजुल साथ।।

प्रभु की   व्यापक   दृष्टि से, बचा न  कोई  एक।

'शुभम्' यही नित सीख से,मत खो जीव विवेक।।


दिया   विधाता  ने   यहाँ,  कर्मों    के अनुसार।

जीव   सभी  नित भोगते, जीवन  बिना विचार।।

बिना   विधाता   के यहाँ, चले न कोई काम।

कर्ता सबका  एक     है,  मात्र   जगत  में राम।।


परम  पिता   परमात्मा, प्रणत  प्रणव सौ   बार।

मनुज   योनि   दी   धन्य मैं, कर्मों   के अनुसार।।

पूर्ण      मात्र  परमात्मा,  अन्य    अधूरे जीव।

वह   विराट  निस्सीम है,  बंधित  सभी जरीव।।


               एक में सब


ईश्वर प्रभु    भगवान के, ब्रह्म विधाता  नाम।

सभी     कहें   परमात्मा,  जगत नियंता  राम।।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆7.00 आ०मा०

                   ◆●◆

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

वंदन [ कुंडलिया ]

 304/2026


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

                       

                         -1-

अपने  दोनों  जोड़  कर, नत  वंदन में भक्त।

सेवा  करता  ईश की,चरण   युगल अनुरक्त।।

चरण युगल अनुरक्त,जनक जननी को ध्याये।

मिलें   सिद्धियाँ  अष्ट,नवों   निधियों को पाये।।

'शुभम्' नमन की रीति,उठाया नर को तप ने।

धन्य -धन्य वह   जीव, करे  वंदन  कर अपने।।


                         -2-

वंदन     का   चंदन   धरे,  रहे   महकता देह।

शुभता के  आशीष   से, मिले   ईश  का नेह।।

मिले   ईश  का  नेह, मिटें   नित   की बाधाएँ।

विपदाएँ     हों    नष्ट, सदा    विश्वास जगाएँ।।

'शुभम्' करें शुभ काज,करे दुनिया अभिनंदन।

विनत   भाव   की   धार, बहाए  निर्मल वंदन।।


                         -3-

वीणा वादिनि   शारदा,  तव   वंदन  में आज।

भक्त विनत अनुरक्त है,सकल सुधारें   काज।।

सकल  सुधारें  काज, काव्य-रथ  रुके न मेरा।

नित  नूतन   हों   भाव, शब्द   का कोष घनेरा।।

'शुभम्'  कृपा  कर  माथ, नहीं  दें कच्चा मीणा।

नत मस्तक दो हाथ,बजा दो  कवि  की वीणा।।


                         -4-

वंदन के  शुभ  भाव  से,  मिले गुणों का कोष।

जागे   विपुल   विनम्रता,मिटें सकल उर- दोष।।

मिटें   सकल   उर-दोष, ओघ-अघ नष्ट कराए।

पावनता    का     कोष, अंग   में नित्य समाए।।

'शुभम्' लगा जब भाल, महकता मह-मह  चंदन।

विपदाएँ   दे   टाल,   भक्त   का   निर्मल वंदन।।


                         -5-

माता   के   शुभ  भाव  से, वंदन करते नित्य।

अपने   भारत   देश को,  शशि   तारे आदित्य।।

शशि  तारे आदित्य,  सिंधु  कलकल  सरिताएँ।

पंच   तत्त्व   के  सत्त्व,  नित्य  गुणगीता गाएँ।।

'शुभम्'   पुत्र जो  नित्य,देश को अपने  ध्याता।

क्यों   न  लड़ावे   लाड़,   पुत्र को भारत माता।।


शुभमस्तु,


25.09.2026◆ 6.30 आ०मा०

                     ◆●◆

आदमी के पंख नहीं [ अतुकांतिका ]

 303 / 2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आदमी के पंख नहीं

फिर भी उड़ता है

धन बल पैसे से

पाँव धरती पर

नहीं पड़ता है।


रह गए बाज पीछे

नोंचने में माँस को

आदमी डकार लिए बिना

निकाल रहा भड़ास को।


मोर हैं न कोयल

गौरैया न हंस है

कृष्ण लीला कर रहा

कंस का अवतंस है।


मुर्गे की कुकड़ कूं

आहार भी कुछ वैसा ही

गंगा में लगा गोते

प्रयागराज आवाजाही।


आदमी की देह में

आदमी भी तो नहीं

ईंट सीमेंट के गेह में

जमा रहा दिमागी दही।


प्रजाति नई जीव की

आदमी नमूना  है

ठग रहा अपनों को

लगा रहा चूना  है।


शुभमस्तु,


24.09.2026 ◆ 8.00 प०मा०

                   ◆●◆

कहना बड़ा मुश्किल [ गीतिका ]

 302/ 2026


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आदमी में  आदमी   है, कहना  बड़ा मुश्किल।

कथन सच्चा लाजमी है, कहना बड़ा मुश्किल।।


आँख   दो   दो  कान   हैं, हैं  हाथ   दो  दो   पैर ,

दर्द   की हलकी नमी  है, कहना  बड़ा मुश्किल।


आदमी   की  भीड़   में ,  खोया   हुआ इंसान,

इंसानियत की ही कमी है, कहना बड़ा मुश्किल।


होंठ   पर   मुस्कान   है,पर  आग   भीतर   है,

प्यार से  सूखी  जमी  है,कहना बड़ा  मुश्किल।


गैर   हों     अपने   भले,   अपने   नहीं  अपने,

आदमी  ये  आलमी है, कहना   बड़ा मुश्किल।


चढ़   रही    चींटी ,  कभी   ऊपर कभी  नीचे,

असल है या   डमी  है, कहना   बड़ा मुश्किल।


सीख   लेता   है 'शुभम्' ,  उन  चींटियों से  ये,

आदमी यदि   उद्यमी   है, चढ़ना  नहीं मुश्किल।


शुभमस्तु,


24.09.2026◆3.00 प०मा०

               ◆●◆

कंबल दो रजाई दो [ गीतिका ]

 301/ 2026



       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बढ़ने  लगा  है   शीत, कंबल   दो रजाई  दो।

मन   गा   रहा है गीत, कंबल  दो रजाई दो।।


झरने   लगी है ओस,अंबर   से  नहीं दिखता,

रातें   हुईं   विपरीत, कंबल   दो   रजाई  दो।


बिजली  नहीं बादल  नहीं,  बरसा नहीं  पानी,

है   धूप  ही  मनमीत, कंबल   दो रजाई  दो।


याद  भी  उनकी, भुलाई   ही    नहीं जाती,

तन-मन जगी   है प्रीत, कंबल  दो रजाई दो।


आग  की   लपटें,  बुलातीं   पास में  अपने,

तन की  सुखानी तीत,  कंबल दो रजाई दो।


चिड़िया  सिकुड़ती  नीड़ में, है से रही अंडे,

वर्षा    गई   है   बीत,  कंबल   दो रजाई दो।


चल 'शुभम्'  हम  भी चलें, बढ़ता  अँधेरा है,

होना  नहीं   भयभीत,   कंबल दो रजाई दो।


शुभमस्तु,


24.09.2026◆ 1.45 प०मा०

                 ◆●◆

अब तो उजाला हो [ गीतिका ]

 300/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


खुल  गए   कॉलेज,  अब  तो  उजाला हो।

बढ़-चढ़ मिले नॉलेज, अब तो  उजाला हो।।


बिल्डिंगें   ऊँची ,   भवन   मरमर   जड़े सारे,

उचित   है   मैसेज, अब    तो   उजाला हो।


दिखते   नहीं   विद्यार्थी,ऑफिस   में   हैं बाबू ,

मालिक  बने   अंग्रेज, अब  तो  उजाला हो।


बैंक   में    अंबार ,  शुल्कों   के    लगे    ऊँचे,

सज   गई   है    सेज, अब   तो  उजाला हो।


बिन  पढ़े     होगी  नहीं , शादी कहीं  से भी,

बढ़   गया   है  क्रेज़,  अब   तो   उजाला हो।


पढ़ते  सभी लड़के,यहाँ पर लड़कियाँ भी हैं,

मोटा  मिले    पैकेज, अब   तो  उजाला  हो।


देखे   सभी   ये  दृश्य,  सारे आँख  से अपनी,

पलटे  नहीं  बस  पेज, अब  तो उजाला हो।


शुभमस्तु,

24.09.2026◆ 12.15 प० मा०

              ◆●◆

गुरुवार, 24 सितंबर 2026

हम क्या करें [गीतिका]

 299/2026


         


© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आदमी   मिलता   नहीं,  हम  क्या   करें।

ढूँढ़  मारा   सब    कहीं, हम   क्या   करें।।


आगे    पीछे    आदमी      ही    आदमी,

दूरियाँ  फिर   भी  रहीं, हम   क्या   करें।


अक्ल  का   पुतला   सभी    कहते  उसे,

खून  की   नदियां   बहीं ,हम  क्या  करें।


अपने   पड़ौसी   को    नहीं   पहचानता,

फिर भी कहें उसको जहीं, हम  क्या करें।


गाँव      जंगल    नगर   में    है   छा   गया,

ख्वाव में   भी   है   यहीं,   हम    क्या  करें।


लोक    में    परलोक    में   उसकी    रज़ा,

अनगिनत   उसकी   महीं,   हम  क्या करें।


खोज    करता    है  'शुभम्'     इंसां   मिले,

होती    नहीं   पर   मनचहीं, हम   क्या करें।


शुभमस्तु,


24.09.2026◆6.00 आ०मा०

                 ◆●◆

टन-टन टनाटन [ गीतिका]

 298/2026


     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जेब   हो  अपनी  गरम, टन-टन टनाटन।

आदमी  है    बे शरम,   टन-टन टनाटन।।


देश जाए  भाड़ में, मुझको   पड़ी   क्या ,

कर्म   ही   मेरा  धरम,   टन-टन  टनाटन।


असलियत का  भेद,यों  खुलता नहीं है,

जिंदा रहे जन का भरम, टन-टन टनाटन।


छातियों में  अब नहीं, धड़का करें   दिल,

पत्थरों   के हैं   मरम,   टन-टन टनाटन।


अब नहीं  अच्छा- बुरा, कुछ भी यहाँ पर,

कर रहा  है सब  करम, टन-टन टनाटन।


वासना  की     भूख    ने,   ऐसा सताया,

सचल है  उनका   हरम,  टन-टन टनाटन।


दूध   के    सम्बंध   भी,  बदबू   भरे   हैं,

चाहिए नर  को चरम,   टन-टन  टनाटन।


शुभमस्तु,


23.09.2026◆10.45 आ०मा०

                     ◆●◆

बज रहा थोथा चना [ गीतिका ]

 297/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बज   रहा   थोथा  चना, क्या  कीजिए।

कर   रहा   है रव  घना,  क्या  कीजिए।।


प्यार  का  नाटक,   निरंतर  छल    रहा,

घर   हुआ   है   अनमना, क्या कीजिए।


आस्तीनों      में    सपोले ,    डंस    रहे,

खून   पीते   अनछना,   क्या   कीजिए।


मंदिरों    में      रूप   बदले,   चोर   हैं,

भक्त   को  है   झुनझुना, क्या कीजिए।


आदमी     अज्ञान     में,  मदमस्त     है,

अज्ञता  ने   ही     जना,  क्या कीजिए।


चूसते    नेता     सभी,  जनता     यहाँ,

छद्म   का   तंबू    तना,   क्या  कीजिए।


कज्जली    है   कोठरी,  बचना 'शुभम्' ,

करना   नहीं    रे   बचपना, क्या कीजिए।


शुभमस्तु,


23.09.2026◆10.00आ०मा०

                ◆●◆

मिट्टी का ये तन-मन सारा [ गीत ]

 296/2026


 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मिट्टी का ये

तन-मन सारा

मिट्टी का ही गेह बनाए।


अबाबील 

धनचिड़ी पखेरू

तिनके और मृत्तिका लेकर

रखती संतति

वहाँ सुरक्षित

है निश्चिंत अंड निज सेकर

लार और

जलकण पंखों से

निज सपनों से  नेह सजाए।


पाँच तत्त्व की

काया तेरी

पाँच तत्त्व का नीड़ निराला

पाँच तत्त्व में

मिल जाना है

रहे न जीवन गीत उजाला

रहे धूप

वर्षा से  निश्चित

जो देखे  संदेह उगाए।


जब तक जीना

तब तक सीना

खेल यही चलते रहना है

तन का नहीं

भरोसा क्षण भर

इस लोंदे का क्या कहना है

खेह विनिर्मित

खेह नीड़ तज

पुनः देह जा खेह समाए।


शुभमस्तु,


22.09.2026◆3.30 आ०मा०

                      ◆●◆

मानवता [ चौपाई ]

 295/2026


        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मानव     देह    धरे    जो  आया।

जीव  वही   मानव    कहलाया।।

मानवता    का    धर्म   यही    है।

तन   अनुरूपी   कर्म   सही  है।।


सेवा     धर्म     निभाता    कोई।

मानवता   पटु वह    नर    होई।।

ममता  दया  प्रेम   करुणा   का।

बहता  है नद नित  वरुणा  का।।


मानवता   नर    जो    खो  देता।

दनुज वृत्ति   उर   में  भर  लेता।।

मानव  तन     में    दानव   होते।

ममता   प्रेम    मृदुलता    खोते।।


क्रूर  कंस     रावण    अतिचारी।

निज कर्मों   से   करते   ख्वारी।।

सत्य  आचरण   जो   झुठलाया।

मानवता  को     दूर     भगाया।।


दुर्व्यसनों    में     रत   हो  जाता।

तज मानवता  सत  को   खाता।।

अहंकार   हर    तप   का  नाशी।

हरिद्वार   क्या     गंगा    काशी।।


बड़े-बड़े       तपसी     सन्यासी।

त्याग   तपस्या    हुए    उदासी।।

तज मानवता  बन   व्यभिचारी।

हुए धरा   पर    सिल   से भारी।।


'शुभम्'  नहीं   तजनी  मानवता।

यद्यपि हो  कितनी   भी लघुता।।

दानव   अंत   बुरा    ही    होता।

शकटासुर - सा   मिटता   रोता।।


शुभमस्तु,


21.09.2026◆12.00मध्याह्न

                 ◆●◆

त्योहारों का देश ये [ दोहा गीतिका ]

 294/2026

        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


त्योहारों   का   देश   है,   भारतवर्ष महान।

दीवाली  होली  सदा,  विजयादशमी शान।।


गुजराती   बँगला    कई, भाषाओं की धूम,

सर्वश्रेष्ठ  हिंदी  सदा, करता  जग गुणगान।


राम  कृष्ण  प्रकटे  यहाँ,यही  बुद्ध का देश,

तुलसी  सूर  कबीर  के,अमर  नाम का मान।


सरस्वती   गंगा    यहीं,  सरयू  यमुना   धार,

पावन   करतीं   हैं धरा,भारत  की पहचान।


हिंदू सिख मुस्लिम सभी,रहते मिलकर एक,

भारत  के  रणबाँकुरे,सुगठित सुखद वितान।


धर्म   सनातन   देश में,  सरसाए नित भव्य,

कर्ण वीर   रणधीर   का, सदा अमर है दान।


'शुभम्' बड़ा  सौभाग्य  है, जन्मा मैं इस देश,

कागज पर मसि लेखनी,चलती नित्य विहान।


शुभमस्तु,


21.09.2026◆7.30 आ०मा०

                      ◆●◆

सर्वश्रेष्ठ हिंदी सदा [ सजल ]

 293/2026

 

समांत          : आन

पदांत           :अपदांत

मात्राभार       :24.

मात्रा पतन    : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


त्योहारों   का   देश   है,   भारतवर्ष महान।

दीवाली  होली  सदा,  विजयादशमी शान।।


गुजराती बँगला    कई, भाषाओं की धूम।

सर्वश्रेष्ठ  हिंदी  सदा, करता  जग गुणगान।।


राम  कृष्ण  प्रकटे  यहाँ,यही  बुद्ध का देश।

तुलसी  सूर  कबीर  के,अमर  नाम का मान।।


सरस्वती   गंगा    यहीं,  सरयू  यमुना   धार।

पावन   करतीं   हैं धरा,भारत  की पहचान।।


हिंदू सिख मुस्लिम सभी,रहते मिलकर एक।

भारत  के  रणबाँकुरे,सुगठित सुखद वितान।।


धर्म   सनातन   देश में,  सरसाए नित भव्य।

कर्ण वीर   रणधीर   का, सदा अमर है दान।।


'शुभम्' बड़ा  सौभाग्य  है, जन्मा मैं इस देश।

कागज पर मसि लेखनी,चलती नित्य विहान।।


शुभमस्तु,


21.09.2026◆7.30 आ०मा०

                      ◆●◆

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

निराशा [ कुंडलिया]

 291/2026


              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

आशा   के   ही   साथ में,सदा निराशा वास।

अपनी   टाँग   अड़ा   रही,संग ले रही श्वास।।

संग   ले   रही   श्वास,  एक  पल दूर न जाए।

खंडित कर विश्वास,  उसे   पथ   से भटकाए।।

रहना   'शुभम्'  सचेत,  नहीं हो  उलटा पाशा।

छोड़ निराशा बंधु, थाम   कर   उज्ज्वल आशा।।


                         -2-

झूले   में   नर   झूलता,  आश-निराशा  बीच।

दोलन   ही  होता    रहे,रही    निराशा सींच।।

रही  निराशा   सींच,डिगाती  प्रति पल रहती।

आशा   के कर  खींच,  बात  बेढब ही कहती।।

'शुभम्' न व्यक्ति प्रबुद्ध,कभी निज आशा भूले।

न   दे   निराशा   साथ, नहीं    भटके पथ झूले।।


                          -3-

आशा   को   मत   छोड़िए,चिंतन  रहे सकार।

नहीं निराशा   पास   में, पल  को फटके द्वार।।

पल को   फटके  द्वार, दिशा सुथरी मिल जाएँ।

भटकन   से    रह   दूर,  दिशाएँ   लोरी गाएँ।।

'शुभम्' न मन में देख, एक पल कभी दुराशा।

महक रहा ज्यों फूल, महकती हो वह आशा।।


                         -4-

चढ़ती   चींटी  शृंग   पर,  विजय पताका साथ।

न हो   निराशा   लेश भी,सदा  उच्च रख माथ।।

सदा   उच्च   रख   माथ,  निरंतर बढ़ती जाती।

करती   पंथ     प्रशस्त,    हंसिनी-सी   मुस्काती।।

'शुभम्'  न  कोई दोष, किसी के सिर पर मढ़ती।

तप   में     रहती   लीन,  शृंग के ऊपर  चढ़ती।।


                          -5-

कछुआ   सँग   खरगोश की,दौड़  न भूले लोग।

आशा   में  कछुआ  रहा,   न   था निराशा-रोग।।

न था   निराशा-रोग,शशक  तरुवर तल सोया।

हार    गया   वह   दौड़, अंत    में   भारी रोया।

'शुभम्' न   हुआ निराश,सदा आशा का सतुआ।

पिया करे   रस  घोल, चला ज्यों पथ में कछुआ।।

शुभमस्तु,


18.09.2026◆5.45 आ०मा०

                     ◆●◆

सीख' [ अतुकांतिका ]

 290/2026


          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कितनी ही 

दुर्विनीता माताओं ने

अपनी ही 

जायाओं के

अपनी 'सीख'  से

घर बर्बाद किए हैं,

दोष सासों पर

मढ़ा गया

और मूर्खा 

बेटियों ने

अपने ही हाथ

आग में 

झुलसा लिए हैं।


पति और सास से

भिड़वाया

मोबाइल पर

संदेश भिजवाया

कोई काम 

मत करना,

कुछ भी कहे

अगर सास- ननद

तो एक की

चालीस कहना,

पीछे मत रहना।


जलती हुई आग में

एक चिनगी ने

बड़ा काम किया,

पति-गृह को उजाड़ कर

सास-ननद को 

बदनाम किया,

जबकि चाबी 

कहीं और से ही

भरी गई,

नई बनी गृहस्थी

माँ के हाथों

उजाड़ी गई।


एक नहीं

हजारों निदर्शन 

विद्यमान हैं,

जहाँ माताएँ ही

बेटियों की दुश्मन हैं

कमान हैं,

पर मूर्खाओं को

कोई समझा भी 

तो नहीं सकता।


शुभमस्तु,


18.09.2026◆5.15आ०मा०

                   ◆●◆

गुरुवार, 17 सितंबर 2026

पेट की ये आग [ गीत ]

 289/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पेट की ये आग

करा लेती है

करतब  कितने-कितने!


देखने वाले

अंगुलियाँ दबा लें 

दाँतों के तले

है नहीं 

कोई घर बार

सब छोड़ चले

बाँध कर नजरें

खड़े हैं

भीड़ में इतने-इतने।


जान की परवाह बिना

पटरे पर चलना

नर्तित होना

सहज नहीं है

ये काम

हँसना -रोना

सोच लेते हैं

ये दर्शकगण

उनके फ़ितने।


आदमी तो आदमी

कम नहीं है

औरत कोई

ज़िंदगी में

कर गुज़रने की

जगी हिम्मत खोई

देह के कमाल

दिखला के

रहते जितने।


शुभमस्तु,


15.09.2026◆3.450 प०मा०

                  ◆●◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...