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डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
मानव देह धरे जो आया।
जीव वही मानव कहलाया।।
मानवता का धर्म यही है।
तन अनुरूपी कर्म सही है।।
सेवा धर्म निभाता कोई।
मानवता पटु वह नर होई।।
ममता दया प्रेम करुणा का।
बहता है नद नित वरुणा का।।
मानवता नर जो खो देता।
दनुज वृत्ति उर में भर लेता।।
मानव तन में दानव होते।
ममता प्रेम मृदुलता खोते।।
क्रूर कंस रावण अतिचारी।
निज कर्मों से करते ख्वारी।।
सत्य आचरण जो झुठलाया।
मानवता को दूर भगाया।।
दुर्व्यसनों में रत हो जाता।
तज मानवता सत को खाता।।
अहंकार हर तप का नाशी।
हरिद्वार क्या गंगा काशी।।
बड़े-बड़े तपसी सन्यासी।
त्याग तपस्या हुए उदासी।।
तज मानवता बन व्यभिचारी।
हुए धरा पर सिल से भारी।।
'शुभम्' नहीं तजनी मानवता।
यद्यपि हो कितनी भी लघुता।।
दानव अंत बुरा ही होता।
शकटासुर - सा मिटता रोता।।
शुभमस्तु,
21.09.2026◆12.00मध्याह्न
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