शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

कहना बड़ा मुश्किल [ गीतिका ]

 302/ 2026


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आदमी में  आदमी   है, कहना  बड़ा मुश्किल।

कथन सच्चा लाजमी है, कहना बड़ा मुश्किल।।


आँख   दो   दो  कान   हैं, हैं  हाथ   दो  दो   पैर ,

दर्द   की हलकी नमी  है, कहना  बड़ा मुश्किल।


आदमी   की  भीड़   में ,  खोया   हुआ इंसान,

इंसानियत की ही कमी है, कहना बड़ा मुश्किल।


होंठ   पर   मुस्कान   है,पर  आग   भीतर   है,

प्यार से  सूखी  जमी  है,कहना बड़ा  मुश्किल।


गैर   हों     अपने   भले,   अपने   नहीं  अपने,

आदमी  ये  आलमी है, कहना   बड़ा मुश्किल।


चढ़   रही    चींटी ,  कभी   ऊपर कभी  नीचे,

असल है या   डमी  है, कहना   बड़ा मुश्किल।


सीख   लेता   है 'शुभम्' ,  उन  चींटियों से  ये,

आदमी यदि   उद्यमी   है, चढ़ना  नहीं मुश्किल।


शुभमस्तु,


24.09.2026◆3.00 प०मा०

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