गुरुवार, 24 सितंबर 2026

मिट्टी का ये तन-मन सारा [ गीत ]

 296/2026


 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मिट्टी का ये

तन-मन सारा

मिट्टी का ही गेह बनाए।


अबाबील 

धनचिड़ी पखेरू

तिनके और मृत्तिका लेकर

रखती संतति

वहाँ सुरक्षित

है निश्चिंत अंड निज सेकर

लार और

जलकण पंखों से

निज सपनों से  नेह सजाए।


पाँच तत्त्व की

काया तेरी

पाँच तत्त्व का नीड़ निराला

पाँच तत्त्व में

मिल जाना है

रहे न जीवन गीत उजाला

रहे धूप

वर्षा से  निश्चित

जो देखे  संदेह उगाए।


जब तक जीना

तब तक सीना

खेल यही चलते रहना है

तन का नहीं

भरोसा क्षण भर

इस लोंदे का क्या कहना है

खेह विनिर्मित

खेह नीड़ तज

पुनः देह जा खेह समाए।


शुभमस्तु,


22.09.2026◆3.30 आ०मा०

                      ◆●◆

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...