309/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
खोजने में वे लगे हैं छेद, मालूम है ये।
जानना इस राज का भी भेद,मालूम है ये।।
ख़ुद गिरें वे कूप में, या आग में,
दिल में न उनके क्लेद, मालूम है ये।
चैन से रहना नहीं, भाता उन्हें,
खून में खड़िया घुली सफेद, मालूम है ये।
प्रेम का दुर्भिक्ष ही, लिखवा लिया,
आठों फहर निर्वेद, मालूम है ये।
क्या कहा कैसे कहा , अज्ञात सब,
सिर में भरा बस मेद, मालूम है ये।
जो बना जिसके लिए, करता वही,
उनको नहीं कुछ खेद, मालूम है ये।
नाव डूबे देश की चाहे 'शुभम्',
उनसे नहीं उम्मेद, मालूम है ये।
शुभमस्तु,
27.09.2026◆4.15 प०मा०
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