308/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
तुझ-सा नहीं गुस्ताख़, मैंने छान मारा।
देखे करोड़ों लाख , मैंने छान मारा।।
खा रहा जिस थाल में, आहार अपना,
करता वहीं सूराख, मैंने छान मारा।
साँप बिच्छू से नहीं, उम्मीद कोई,
है वत्स तू वैशाख, मैंने छान मारा।
झोंपड़ी की छाँव में, नाटक दिखाए,
खाता गपागप दाख, मैंने छान मारा।
पंडित कभी मुल्ला कभी,क्रिस्तान भी तू,
तेरी नहीं कुछ साख, मैंने छान मारा।
सबसे बड़ी कुर्सी तुझे, मिलनी नहीं है,
उम्मीद तेरी राख, मैंने छान मारा।
दुर्भाग्य होगा देश का,पी एम हो तू,
देता 'शुभम्' ये भाख, मैंने छान मारा।
शुभमस्तु,
27.09.2026◆2.00प०मा०
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