शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

आदमी के पंख नहीं [ अतुकांतिका ]

 303 / 2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आदमी के पंख नहीं

फिर भी उड़ता है

धन बल पैसे से

पाँव धरती पर

नहीं पड़ता है।


रह गए बाज पीछे

नोंचने में माँस को

आदमी डकार लिए बिना

निकाल रहा भड़ास को।


मोर हैं न कोयल

गौरैया न हंस है

कृष्ण लीला कर रहा

कंस का अवतंस है।


मुर्गे की कुकड़ कूं

आहार भी कुछ वैसा ही

गंगा में लगा गोते

प्रयागराज आवाजाही।


आदमी की देह में

आदमी भी तो नहीं

ईंट सीमेंट के गेह में

जमा रहा दिमागी दही।


प्रजाति नई जीव की

आदमी नमूना  है

ठग रहा अपनों को

लगा रहा चूना  है।


शुभमस्तु,


24.09.2026 ◆ 8.00 प०मा०

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