305/2026
[भगवान,ईश्वर,प्रभु,विधाता,
परमात्मा ]
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सब में एक
लीलाएँ प्रतिपल करें,अखिल सृष्टि भगवान।
मानव यह जाने नहीं,व्यापक ईश महान।।
माया ने भगवान की, लुभा लिया संसार।
उनकी इच्छा से चले, सबका कारोबार।।
ईश्वर -महिमा जानते, नहीं मनुज खग ढोर।
जलजीवी जो जंतु हैं,उन्हें न मिलता छोर।।
ईश्वर स्वामी सृष्टि के, वही नियंता आप।
उन्हें नहीं हैं व्यापते, शीतलता या ताप।।
प्रभु जी से विनती यही,रखें कृपा का हाथ।
जीव जिएं जीवन सभी, सुख से मिलजुल साथ।।
प्रभु की व्यापक दृष्टि से, बचा न कोई एक।
'शुभम्' यही नित सीख से,मत खो जीव विवेक।।
दिया विधाता ने यहाँ, कर्मों के अनुसार।
जीव सभी नित भोगते, जीवन बिना विचार।।
बिना विधाता के यहाँ, चले न कोई काम।
कर्ता सबका एक है, मात्र जगत में राम।।
परम पिता परमात्मा, प्रणत प्रणव सौ बार।
मनुज योनि दी धन्य मैं, कर्मों के अनुसार।।
पूर्ण मात्र परमात्मा, अन्य अधूरे जीव।
वह विराट निस्सीम है, बंधित सभी जरीव।।
एक में सब
ईश्वर प्रभु भगवान के, ब्रह्म विधाता नाम।
सभी कहें परमात्मा, जगत नियंता राम।।
शुभमस्तु,
27.09.2026◆7.00 आ०मा०
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