शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

कंबल दो रजाई दो [ गीतिका ]

 301/ 2026



       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बढ़ने  लगा  है   शीत, कंबल   दो रजाई  दो।

मन   गा   रहा है गीत, कंबल  दो रजाई दो।।


झरने   लगी है ओस,अंबर   से  नहीं दिखता,

रातें   हुईं   विपरीत, कंबल   दो   रजाई  दो।


बिजली  नहीं बादल  नहीं,  बरसा नहीं  पानी,

है   धूप  ही  मनमीत, कंबल   दो रजाई  दो।


याद  भी  उनकी, भुलाई   ही    नहीं जाती,

तन-मन जगी   है प्रीत, कंबल  दो रजाई दो।


आग  की   लपटें,  बुलातीं   पास में  अपने,

तन की  सुखानी तीत,  कंबल दो रजाई दो।


चिड़िया  सिकुड़ती  नीड़ में, है से रही अंडे,

वर्षा    गई   है   बीत,  कंबल   दो रजाई दो।


चल 'शुभम्'  हम  भी चलें, बढ़ता  अँधेरा है,

होना  नहीं   भयभीत,   कंबल दो रजाई दो।


शुभमस्तु,


24.09.2026◆ 1.45 प०मा०

                 ◆●◆

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...