301/ 2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
बढ़ने लगा है शीत, कंबल दो रजाई दो।
मन गा रहा है गीत, कंबल दो रजाई दो।।
झरने लगी है ओस,अंबर से नहीं दिखता,
रातें हुईं विपरीत, कंबल दो रजाई दो।
बिजली नहीं बादल नहीं, बरसा नहीं पानी,
है धूप ही मनमीत, कंबल दो रजाई दो।
याद भी उनकी, भुलाई ही नहीं जाती,
तन-मन जगी है प्रीत, कंबल दो रजाई दो।
आग की लपटें, बुलातीं पास में अपने,
तन की सुखानी तीत, कंबल दो रजाई दो।
चिड़िया सिकुड़ती नीड़ में, है से रही अंडे,
वर्षा गई है बीत, कंबल दो रजाई दो।
चल 'शुभम्' हम भी चलें, बढ़ता अँधेरा है,
होना नहीं भयभीत, कंबल दो रजाई दो।
शुभमस्तु,
24.09.2026◆ 1.45 प०मा०
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