रविवार, 8 सितंबर 2019

ग़ज़ल

                  
दर्दोग़म अपना  आम करता हूँ,
आईने  को  सलाम  करता हूँ।

दायरों    की   लक़ीर    के भीतर,
ख़ुदपरस्ती   तमाम   करता हूँ।

भेद खुलने का डर मुझे क्यों हो,
मैं  अपना  ही  काम   करता हूँ। 

सबकी   खिड़की   में झाँकने वाले,
तेरी  कमियों को  आम करता हूँ।

 स्याह दामन है जिसका भी 'शुभम',
उसको  अपना  गुलाम करता हूँ।

💐 शुभमस्तु !
✍रचयिता ©
🦋 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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