शनिवार, 2 जनवरी 2021

साहित्य -सृजन:2020 🏕️ एक आत्म मूल्यांकन


◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

✍️ लेखक©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

 🦚ॐ श्री सरस्वत्यै नमः🦚

                वीणा वादिनी विद्या और काव्य की अधिष्ठात्री  माँ  सरस्वती की कृपा है कि मैं आज भी वर्ष 1963 (11 वर्ष) की अवस्था से अद्यतन माँ सरस्वती     की अनवरत साधना में निरत रहते हुए काव्य - साधना  में संलग्न हो रहा हूँ। इस अंतराल में कई हज़ार कविताएँ, लेख, निबंध , एकांकी ,कहानी, लघुकथाएँ,  ,व्यंग्य आदि विविधरूपिणी पद्य और गद्य की रचनाएँ  लिखने के साथ - साथ अभी तक बारह पुस्तकों का प्रकाशन भी हो सका है। इस अंतराल में देश और विदेश की विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित भी किया गया। ये मेरे लिए अत्यंत हर्ष और सौभाग्य का विषय है। 

रचना लेखन विवरण:

------------------------------------

  वर्ष : 2018 2019 2020

-------------------------------------

  योग:  225   387   530

-------------------------------------

  वर्ष 2020 में मेरी दो पुस्तकों का प्रकाशन  हुआ।

1. आओ आलू आलू खेलें:( बालगीत संग्रह एवं

आलू- शतक) 

2. 'शुभम' व्यंग्य वातायन:( व्यंग्य संग्रह)


 बहुविधा तूलिका मंच के संस्थापक    तथा  पटल  के प्रशासक डॉ. राकेश सक्सेना जी ने  संभवतः 16 अक्टूबर 2018 को मंच की स्थापना की, जो अद्यतन मंच के समस्त रचनाकारों के सहयोग और सेवाभावी योगदान से निरन्तर एक अनुशासन की कोमल रेशमी रज्जू से बंधा हुआ चल रहा है। मैं किसी मंच - प्रतिभागी के महत्व को किसी प्रकार

कमतर नहीं आँक सकता। मुझे यह ख्याल नहीं आ रहा कि कब मुझे इस मंच से जुड़ने का सौभाग्य प्रियवर डॉ. राकेश सक्सेना के द्वारा प्राप्त हुआ। वैसे  प्रदेश के राजकीय उच्च शिक्षा विभाग में सेवारत होने के कारण हम लोग पहले से ही सुपरिचित थे। देश के विभिन्न  साहित्यिक औऱ सामाजिक मंचों पर मेरी  रचनाओं से प्रभावित होकर उन्होंने मुझे इस मंच से जोड़ना उचित समझा। तब से आज आज तक मेरी यह साहित्य यात्रा अनवरत प्रवाहित हो रही है।इसके लिए मंच के समस्त सुधी समीक्षकों ,सरंक्षक डॉ. राम सेवक शर्मा 'अधीर 'जी, के साथ - साथ मंच के समस्त श्रध्देय अग्रज और  आदरणीय अनुज /अनुजाओं , समवयस्क मित्रों का कृतज्ञ हूँ कि जिनके निर्देशन मैं आज भी सीख रहा हूँ; अपने को  विद्यार्थी ही मानता हूं। इस मंच को अपना काव्य -गुरु मानने में भी मुझे कोई आपत्ति नहीं है। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है। आभार व्यक्त करने के लिए नामों का गिनना उचित नहीं होगा, क्योंकि यह सूची इतनी लंबी होगी कि भूलवश नाम न लिखने पर उन्हें तो अच्छा नहीं लगेगा, मुझे भी अन्याय ही अनुभव होगा।

                 इसी स्थान पर मुझे यह कहने में भी कोई आपत्ति नहीं है कि यों तो देश में हजारों साहित्यिक मंच होंगे किन्तु इतना अनुशासित , व्यवस्थित और ईमानदार मंच शायद ही कोई हो। फ़ोटो , वीडियो और ओडियो नहीं भेजने का कठोर नियम नारियल की तरह से बाहर से कड़ा और भीतर से दुग्धवत निर्मल औऱ सनीर है। अन्यथा इस पर कितना कूड़ा -कचरा गिराया जाता , इसकी कोई सीमा नहीं है।इसका अर्थ यह नहीं लिया जाए कि मैं चित्र आदि को कूड़ा -कचरा समझता हूँ ।उनका भी अपना महत्व है , लेकिन एक सीमा तक ही वह सुगन्ध 

देता है। उसकी अतिशयता दुर्गंध ही छोड़ती है। चित्र तो हमारी  अपनी महत्वाकांक्षी भावना के प्रतिरूप हैं। दूसरा उन्हें कितना महत्व देता है , उसका मूल्यांकन इस पर भी निर्भर करता है । इसलिए  इस मंच का  सौंदर्य  और सुरुचि इसी में निहित है।


       लेख के विस्तार की अतिशयता को दृष्टिगत करते हुए इतना ही कहना चाहता हूं कि साहित्य की सेवा , मातृभाषा , जननी और जन्मभूमि की सेवा ही मेरा कर्म है , धर्म है और इसी में मेरा अपना मर्म भी है।

  वर्ष 2021 के प्रथम दिवस की इस पावन वेला में माँ सरस्वती से मेरी यही प्रार्थना है कि आजन्म इसी प्रकार माँ भारती की

सेवा में तन मन और धन से लगा रहूँ।ॐ 


🌷🌷 जाने वाले वर्ष 2020को  भावभीनी विदाई।🌷🌷


💐💐 नवागत वर्ष  2021 का हृदय की गहराइयों से स्वागत💐💐

और आप सभी को बहुत -बहुत शुभकामनाएं और बधाई 💐💐 .......


💐 शुभमस्तु !


01.01.2021◆8.00 अपराह्न।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...