मंगलवार, 31 मई 2022

सागर 🚢 [मुक्तक ]


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✍️ शब्दकार ©

🚢 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                        -1-

प्यार का सागर कभी,खारा नहीं होता प्रिये,

प्यार  जो सच्चा करे,हारा नहीं  रोता  हिये,

त्याग में ही प्यार के,खिलते सुमन हैं सर्वदा,

महकते     दोनों परस्पर, एक दूजे  के  लिए।


                        -2-

अंक में अपने खिलाता, हर नदी को नेह  से,

छोड़कर अपने पिता का,सरि चली है गेह से,

हृदय सागर-सा बनाए,गहन गर भी पी सके,

गगन के  जल को समाएँ,जो बरसता मेह से।


                           -3-

बैठ तू तट पर रहा तो, हाथ कुछ आए नहीं,

जो गया सागर तली में,पा  सके  मुक्ता वहीं,

डूबने का डर सताए,तू निकम्मा  क्यों  बने,

स्वेद जोअपना बहाए,कनक मुक्ता हर कहीं।


                        -4-

स्वीकार सागर ने किया,दूषण प्रदूषण आपका,

मृत देह कचरा देश का,सरि नीर सारा आपका,

मेघ   ने   निर्मल बना कर, आपको ही दे दिया,

भाद्र श्रावण ने भिगोया, अवनि का तल आपका।


                         -5-

गहन सागर -सा बना लें, हम हृदय अपना शुभम्,

सुतल मुक्ता से सजा लें,जगत हो अपना शिवम,

आदमी     से   आदमी का विष, मिटाएँ शंभु-सा,

सत्य का ध्वज हम उठाएँ, विश्व हो तब सुंदरम।


🪴 शुभमस्तु !


३१ मई २०२२■७.००आरोहणम् मार्तण्डस्य।


🚢🪷🚢🪷🚢🪷🚢🪷🚢

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