सोमवार, 27 अप्रैल 2026

क्यों भूलता वे पुस्तकें [ अतुकांतिका ]

 144/2026


        

©शब्दकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पुस्तकों को पढ़ा

आगे बढ़ा

ऊपर चढ़ा

जीवन गढ़ा,

क्यों भूलता वे पुस्तकें।


छोड़ दीं अब पुस्तकें

स्वाध्याय तेरा शून्य है,

आज तेरा 'कल'  में घुसा

अंतर्जाल में ऐसा फंसा

बन गया नर घरघुसा।


ज्ञान की वे देवियाँ

अध्यात्म की वे वेदियाँ

जो पुस्तकें तुमने पढ़ीं

जिंदगी की सीढ़ियां

ऊँची चढ़ीं,

पर आज तू भूला उन्हें।


पुस्तकों से दूरियाँ

कहना नहीं मजबूरियाँ

थीं  जिंदगी की लोरियाँ

सुख चैन की निदिया मिली।


हम पूजते थे पुस्तकें

हम पूजते हैं पुस्तकें

वे मौन माँ की बोलियाँ

रस की भरी वे गोलियाँ

हर समय की साथी वही

जब हाथ में पुस्तक गही।


ज्ञान की बहती नदी

रुकती नहीं सदियों सदी

मत पुस्तकों को छोड़ तू

मत पुस्तकों से मोड़ मू।


शुभमस्तु,


23.04.2026◆7.00प०मा०

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