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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
स्वाद आम का अतिशय खट्टा।
कीर ढूँढ़ता छट्टा-छट्टा।।
अमराई में आई गोरी,
भर आमों से लिया दुपट्टा।
चला प्रभंजन रूख उखाड़े,
लगा आम का ऊँचा चट्टा।
पत्थर मार तोड़ते अमियाँ,
बालक गँवई फेंकें गट्टा।
करो न ओछे काम बालको,
लगे शान को किंचित बट्टा।
सोच समझ कर खेल खेलना,
नहीं समझना जीवन ठट्टा।
'शुभम्' दाँव पर लगे न जीवन,
नहीं मानना इसको सट्टा।
शुभमस्तु,
27.04.2026◆9.00आ०मा०
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