124/2026
समांत : आरे
पदांत : अपदांत
मात्राभार :16.
मात्रा पतन :शून्य।
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सबको अपने लगें दुलारे।
माँ को एकचक्षु सुत प्यारे।।
होता नहीं बुरा - अच्छा कुछ।
बस निजत्व ने पाँव पसारे।।
लैला न थी सुंदरी नारी।
पर मजनू की दृग की तारे।।
इस मन को भा जाए जो भी।
दिखते उसे वहीं उजियारे।।
देख अजनबी भौंकें कूकर।
बनें पालतू टरें न टारे।।
अपनेपन का मोल बड़ा है।
अनभाए सब लगते खारे।।
'शुभम्' श्याम से प्रीति लगा ले।
खुलें प्रेम से बंद किवारे।।
शुभमस्तु,
06.04.2026◆7.15 आ०मा०
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