130/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
मान न मान
मैं सबका मेहमान,
मैं सबसे महान
मैंने लिया है ठान
मेरा सबसे ऊंचा वितान।
मैं खम्भे पर चढ़ जाऊँगा
करिश्मा दिखाऊँगा
विश्वशांति का दूत हूँ
अवार्ड मुझे चाहिए,
प्रत्यक्ष हूँ सुबूत हूँ
वैसे शक्ल से उलूक हूँ।
कोई मुझे मियां मिट्ठू कहे
कोई निखट्टू कहे
जिसे जो कहना है
कहता रहे,
पर मैं सबसे मलूक हूँ,
ऊत हूँ।
मेरा मन
मेरी मनमानी
किसी की नहीं मानी
अपनी ही तानी
बनती हुई बात उलझानी।
देख रहे हैं सब
देखते रहो,
मुझे क्या ?
मैं किसी को नहीं देखता,
'तुरुप' का पत्ता
आत्मघोषित सत्ता
अलबत्ता,
जैसे कोई बिगड़ा हुआ कुत्ता,
हरियाली के बीच कुकुरुमुत्ता।
शुभमस्तु,
10.04.2026◆3.45आ०मा०
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