129/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
कवियों की
कतार के आगे
दौड़ रहे सम्मान।
हर कवि को
यह चाह जगी है
पहले मैं पा जाऊँ
भले दबाने
पड़े पाँव भी
मल-मल तेल लगाऊँ
ले लो चाहे
कितना भी धन
बनूँ काव्य- धनवान।
गौरव बना
काव्य का कोई
कोई कवि आदित्य
कालिदास कोई
कविता का
बिना किसी औचित्य
एक तराजू में
तुलते हैं
बीस पंसेरी धान।
रूप सुंदरी
रूप छटा की
बिखरा रही सुगंध
गले लगाती
भर आलिंगन
कसे बाँह के बंध
ढूँढ़ रही
एकांत मिले जो
कोना यदि सुनसान।
धन देकर
क्रय किए जा रहे
पटका शॉल प्रमाण
सब चलता
पर्दे के पीछे
पाँव खूँदते खांण
छंद ज्ञान
अनभिज्ञ चितेरे
लुटा रहे निज जान।
अंधों में
काने राजा की
बढ़ी हुई है साख
बटर लगाना है
अति उत्तम
लिया नाक से चाख
अखबारों
मुखपोथी पर है
साहित्यिक गुणगान।
शुभमस्तु,
09.04.2026◆ 10.45 आ०मा०
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