137/2026
समांत : इया
पदांत : है
मात्राभार :16.
मात्रा पतन :शून्य
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
जिसने जग में नाम किया है ।
कर्मठ जीवन सदा जिया है।।
करता है नर नष्ट समय को।
विष का ही वह घूँट पिया है।।
विपदा झेल भटकता वन - वन।
युगल ख्यात वह राम - सिया है।।
निशिदिन जल-अभिसिंचन करती।
कहलाती जग में नदिया है।।
घरनी घर को रहे समर्पित।
घर-घर में विख्यात तिया है।।
फल लगते ही झुकते तरुवर।
विनय भाव सिर धार लिया है।।
'शुभम्' कर्म है बीज योनि का।
जन्म-जन्म महके बगिया है।।
शुभमस्तु,
20.04.2026◆6.15 आ०मा०
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