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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
मानव की मन बुद्धि में,कलयुग का नित वास।
दूषित उसके कर्म हैं, दुश्चिंतन का दास।।
धनिक अहं में चूर हैं, करते सदा अनीति,
करते घृणा गरीब से, रसना में परिहास।
फूटी आँख न भा रहे, अमरीका को अन्य,
विश्व-शांति भाती नहीं,चाह रहा ठकुरास।
बिना धैर्य सब व्यर्थ है, वैभव शक्ति अकूत,
जन-जन के हित के लिए, फैले नया उजास।
चिंतन में कल्याण का, चमक रहा हो भानु,
चलता है तब प्रेम का, पल-पल प्रमन प्रभास।
घोड़ों को दाना नहीं,रहे हिनहिना नित्य,
गदहों को अखरोट हैं, अब न सुहाती घास।
'शुभम्' फटे में डालना, नहीं मित्रवर पैर,
अगर पड़ौसी लड़ रहे,कभी न जाना पास।
शुभमस्तु,
13.04.2026◆7.00आ०मा०
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