गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

सागर की महिमा बड़ी [ दोहा ]

 147/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सागर  की  महिमा  बड़ी, सरिताओं का नीर।

निशिदिन भरता गात में, किंचित  नहीं अधीर।।

सागर-जल    खारी   बड़ा,  रूप बड़ा  गंभीर।

निर्मल  जल  दे  मेघ को,  पावस बनी अमीर।।


पर्वत  में   है  उच्चता, सागर सलिल  अथाह।

शिक्षक   प्रेरक   रात-दिन,दृढ़ता   भरा उछाह।।

रत्नाकर   सागर   बड़ा, बसते जलचर   जीव।

मोती  मछली  भेक  भी, सोना   शंख  अतीव।।


सरिता सागर  से  मिले, करती  कलकल  नाद।

लगन लगी पिय मिलन की,और नहीं कुछ याद।।

सागर   से   सरिता  मिली,खारी  हुआ स्वभाव।

बरसी  वर्षा    की    झड़ी,  निर्मल    है बर्ताव।।


मर्यादा  की  सीख    का,   सागर  है प्रतिमान।

छिछलापन करना नहीं,सरसी सरिस सुजान।।

मौन  धैर्य     गंभीरता,   सागर   गुण- आगार।

मूढ़  मनुज  तू   सीख ले, जीवन  में    साभार।।


सागर-धरती   का   सदा,मधुर मिलन संयोग।

मर्यादा    तजते    नहीं,   रत     रहते नीरोग।।

इतराता  सागर    नहीं,  नदियाँ     मिलें हजार।

है    स्वभाव  खारी   भले,  किंतु लुटाता प्यार।।


सागर    में  जो  पैठता,  मोती    मिलें हजार।

पड़ा रहे   जो  तीर   पर, मिलतीं  सीप अपार।।


शुभमस्तु,

30.04.2026 ◆ 10.15 आ०मा०

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