134/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
टेढ़ीमेढ़ी चाल
खुरदरा आचरण
भड़कीला आवरण
विद्रूप चरित्र
रूपसी अपवित्र
सर्वत्र 'वंदनीय' हैं।
समझे सर्वजेता
हम-आप नहीं,नेता
प्रत्यक्ष नहीं लेता
शनैः शनैः अंड सेता
हर आम को
'नमनीय' है।
ठीक समझे हैं आप
वक्र चले सदा साँप
सभी रहे यहाँ काँप
पिलाते हैं दुग्ध
होते देख-देख मुग्ध
नित्य 'जपनीय' है।
सीधा सरल या सपाट
हर कोई देता डांट
सिल्क पहने या टाट
सदा खड़ी उसकी खाट
इनको 'निंदनीय' है।
खोई श्रेष्ठ की पहचान
पूज्य दुष्ट ही इंसान
वही काव्य भी महान
जहाँ वक्रता का वितान
नहीं होता 'कमनीय' है।
शुभमस्तु,
16.04.2026◆1.15 प०मा०
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