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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
-1-
दर्पण में मन के करें, प्रभु-दर्शन दिन-रात।
इष्ट रहें नित ध्यान में,मिले दुखों को घात।।
मिले दुखों को घात, न विपदा कोई आए।
सुखी रहे मनुजात, हृदय में हर्ष उगाए।।
'शुभम्' कर्म कर मीत,सभी प्रभु जी को अर्पण।
पड़े न किंचित धूल,स्वच्छ रख मन का दर्पण।।
-2-
जीवन क्या है सत्य क्या,और जगत क्या मीत।
दर्शन सभी बखानता, क्या यथार्थ सम्प्रीत।।
क्या यथार्थ सम्प्रीत, विषादों में नर खोया।
मिले न साँची प्रीत,कभी हँसता तू रोया।।
'शुभम् ' सदा ही रहे, उधड़ती तेरी सीवन।
दर्शन में जा देख, जीव का कैसा जीवन।।
-3-
जाता दर्शन के लिए,जनगण तीर्थ प्रयाग।
वह्नि जले अघओघ की,माया से अनुराग।।
माया से अनुराग, नहीं परहित को जाना।
लगा तिलक निज भाल,भूप अंधों में काना।।
'शुभम्' ढोंग आरूढ़, हृदय में हिंसा लाता।
मथुरा काशी घूम, लौट वैसा ही जाता।।
-4-
अपना मन यदि शुद्ध हो, जनक- जननि में भक्ति।
दर्शन सबसे श्रेष्ठ हैं, करे सुदृढ़ अनुरक्ति।।
करे सुदृढ़ अनुरक्ति, तीर्थ क्या जाना तेरा।
यमुना- गंग नहान, वृथा सब तेरा-मेरा।।
'शुभम्' इष्ट वे पूज्य, अन्य सब मिथ्या सपना।
रख उनकी उर भक्ति, वही हैं ईश्वर अपना।।
-5-
आओ हम दर्शन करें, अपने उर के बीच।
देखें कितना शुद्ध है,उर में कितनी कीच।।
उर में कितनी कीच, मनुजता कितनी बाकी।
चले निरंतर क्रूर, कर्म की हिंसक चाकी।।
'शुभम्' जीव को जान,स्वयं जैसा समझाओ।
मन-वाणी रख शुद्ध, कर्म कर पावन आओ।।
शुभमस्तु,
30.04.2026◆4.30 प०मा०
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