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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
रखें हृदय में धार,सुहृद सुखद संदेश को।
शुभकर सत उपहार,जीवन के भवितव्य का।।
है उपकारी भाव, स्वजनों के संदेश में।
मित्र तुम्हारी नाव, पार उतारें धार से।।
साधु-संत संदेश ,युग-युग से देते रहे।
रहकर देश-विदेश, परहित में जीना सभी।।
संतति को संदेश, मात-पिता देते सदा।
भीत न हो लवलेश , चुरा न जी श्रम से कभी।।
मानवता का सार, पौराणिक संदेश में।
उनमें जन उपकार, छिपा हुआ सर्वत्र ही।।
सकल सृष्टि भंडार, ग्रहण करें संदेश तो।
शुभतम पर उपकार ,सीख मिले हर व्यक्ति को।।
जब लदते बहु बौर, झुकते हैं तरु भार से।
करना मन में गौर, मानव हित संदेश है।।
देती सरि संदेश,कलकल से अपनी यही।
मानव धरे सुवेश, चरैवेति के गान से।।
होता सुखद विहान,वन पाखी कलरव करें।
रहे न तम का भान, फैलाएं संदेश वे।
गिरती - चढ़ती खूब, चींटी हार न मानती।
नहीं जानती ऊब, देती श्रम - संदेश जो।।
वैसा ही फल लाभ, जैसा जिसका कर्म है।
सन्निविष्ट उस गाभ, सुखद यही संदेश है।।
शुभमस्तु,
09.04.2026◆5.30आ०मा०
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