सोमवार, 27 अप्रैल 2026

रोटी की धरती पर [ नवगीत ]

 143/2026


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


रोटी  की  धरती  पर

रमते

मूली नमक पियाज।


जले उदर में

आग भूख की

जो मिल जाए खाऊँ

न हो मिठाई

दाल भात भी

सूखे रोट चबाऊँ

अंतड़ियाँ

कुलबुला रही हैं

करतीं तुमुल रियाज।


बड़े चाव से

स्वाद आ रहा

भले जली है रोटी

नौंन प्याज

अमृत से लगते

लगे न रोटी खोटी

भूख न देखे

रूखी-सूखी

चलता यही रिवाज़।


धनिक भले

कंगाल भिखारी

उदर सभी का एक

भरे न सोने 

चाँदी से जो

नहीं चाहिए केक

जिससे मिले तृप्ति

अमृत है

जीवन का यह राज।


शुभमस्तु,


23.04.2026◆ 12.15 प०मा०

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