143/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
रोटी की धरती पर
रमते
मूली नमक पियाज।
जले उदर में
आग भूख की
जो मिल जाए खाऊँ
न हो मिठाई
दाल भात भी
सूखे रोट चबाऊँ
अंतड़ियाँ
कुलबुला रही हैं
करतीं तुमुल रियाज।
बड़े चाव से
स्वाद आ रहा
भले जली है रोटी
नौंन प्याज
अमृत से लगते
लगे न रोटी खोटी
भूख न देखे
रूखी-सूखी
चलता यही रिवाज़।
धनिक भले
कंगाल भिखारी
उदर सभी का एक
भरे न सोने
चाँदी से जो
नहीं चाहिए केक
जिससे मिले तृप्ति
अमृत है
जीवन का यह राज।
शुभमस्तु,
23.04.2026◆ 12.15 प०मा०
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