133/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
दो वक्त की
भरपेट रोटी
सबको सुलभ होतीं नहीं।
रात -दिन
जी तोड़ श्रमरत
तन से पसीना बह रहा
रोटी मिलें
ईमान की नर-
देह का
कण-कण दहा
नारियाँ
तपती दुपहरी
ईंट सिर ढोती रहीं।
बैठ ए सी
कक्ष में क्या
रोटियाँ अर्जित करें ?
ईंट ढालें
स्वर्ण की जो
दीन को वर्जित करें
किंतु रोटी
है जरूरी
उदर में लपटें दहीं।
घूमता
संसार सारा
गोल रोटी के लिए
परिक्रमा
दिन-रात होती
कौन भूखा यों जिए
नित्य खाए
कौन रबड़ी
अन्न बिन जीवन कहीं?
शुभमस्तु,
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