सोमवार, 27 अप्रैल 2026

दो वक्त की भरपेट रोटी [ गीत ]

 133/2026


   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दो वक्त की

भरपेट रोटी

सबको सुलभ होतीं नहीं।


रात -दिन

जी तोड़ श्रमरत

तन से पसीना बह रहा

रोटी मिलें 

ईमान की नर-

देह का

कण-कण दहा

नारियाँ

तपती दुपहरी

ईंट सिर ढोती रहीं।


बैठ ए सी 

कक्ष में क्या

रोटियाँ अर्जित करें ?

ईंट ढालें

स्वर्ण की जो

दीन को वर्जित करें

किंतु रोटी 

है जरूरी

उदर में लपटें दहीं।


घूमता 

संसार सारा

गोल रोटी के लिए

परिक्रमा

दिन-रात होती

कौन भूखा यों  जिए

नित्य खाए

कौन रबड़ी

अन्न बिन जीवन कहीं?


शुभमस्तु,


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