123/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
मूर्खता एकांगी नहीं होती
बहुमुखी होती है
जो किसी के आचरण
किसी के संचरण
किसी के चेहरे
किसी के क्रिया-कर्मों में
दिख ही जाती है।
मूर्खता का जिम्मा
किसी आम या खास का नहीं
वह देखी जाती हैं सब कहीं
राजा हो या रंक
अनपढ़ या सुशिक्षित
नेता अथवा अधिकारी
प्राइवेट भी है
वह कभी हो जाती सरकारी
मूर्खता है
विश्वव्यापी बीमारी,
जो लाइलाज है।
पागलखाने में ही नहीं होते मूर्ख
उसके बाहर भी
बहुतायत से मिलते हैं,
लड़ते हैं लड़वाते हैं
आपस में बैर करवाते हैं
दुनिया में अशांति का
कहर ढाते हैं,
और अपने को
दूध से धुला जताते हैं,
रक्तिम क्रांति करवाते हैं
और शांति का अवार्ड
माँगते हुए देखे जाते हैं।
अपने चारों ओर
एक नजर तो घुमाइए
आपको एक नहीं
अनेक मूर्ख दिख जाएँगे,
जो अपने को सबसे
बुद्धिमान बताएँगे,
वह सर्वव्यापी जो है,
मूर्खता के अनेक पर्यायों से
भरा हुआ है ये जगत,
कभी- कभी मूर्खों की भी
होती है बड़ी आवभगत।
मूर्खता ने
मनचाहा डेरा डाला है,
बुद्धिमानों के समक्ष
अपना कदम निकाला है,
कोई तो कभी-कभी
मूर्ख बन जाता है
और कुछ लोग
सदाबहार मूर्खता का मुकुट
शिरोधार्य करते हैं,
वे मूर्ख बनने में किंचित मात्र भी
नहीं डरते हैं,
आज विश्वव्यापी
मूर्खता की सुनामी आयी हुई है,
पर क्या कीजिए
सब दिन होत न एक समान।
शुभमस्तु,
03.04.2026◆4.30 आ०मा०
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