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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
जिसने जग में नाम किया है ।
कर्मठ जीवन सदा जिया है।।
करता है नर नष्ट समय को,
विष का ही वह घूँट पिया है।
विपदा झेल भटकता वन - वन,
युगल ख्यात वह राम - सिया है।
निशिदिन जल-अभिसिंचन करती,
कहलाती जग में नदिया है।
घरनी घर को रहे समर्पित,
घर-घर में विख्यात तिया है।
फल लगते ही झुकते तरुवर,
विनय भाव सिर धार लिया है।
'शुभम्' कर्म है बीज योनि का,
जन्म-जन्म महके बगिया है।
शुभमस्तु,
20.04.2026◆6.15 आ०मा०
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