गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

सागर है प्रतिमान [ सोरठा ]

 148/2026


              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सरिताओं का नीर, सागर की महिमा बड़ी।

किंचित  नहीं अधीर,निशिदिन भरता गात में।।

रूप बड़ा  गंभीर,    सागर-जल खारी बड़ा।

पावस   बनी   अमीर,निर्मल  जल दे मेघ को।।


सागर   सलिल  अथाह,  पर्वत में है उच्चता।

दृढ़ता   भरा उछाह,शिक्षक  प्रेरक रात-दिन।।

बसते जलचर   जीव,  रत्नाकर   सागर बड़ा।

सोना   शंख  अतीव,मोती  मछली भेक भी।।


करती    कलकल  नाद, सरिता से सागर मिले।

और नहीं कुछ याद,लगन  लगी पिय मिलन की।।

खारी    हुआ   स्वभाव, सागर से सरिता मिली।

निर्मल     है   बर्ताव,  बरसी    वर्षा  की झड़ी।।


सागर  है   प्रतिमान,   मर्यादा की सीख का।

सरसी सरिस सुजान,छिछलापन   करना नहीं।।

सागर     गुण-आगार,    मौन  धैर्य गंभीरता।

जीवन  में     साभार,मूढ़   मनुज तू  सीख   ले।।


मधुर मिलन संयोग,सगर -धरती का सदा।

रत      रहते   नीरोग,  मर्यादा  तजते नहीं।।

नदियाँ     मिलें   हजार,   इतराता  सागर नहीं।

किंतु   लुटाता   प्यार,है   स्वभाव   खारा भले।।


 मोती    मिलें   हजार, सागर  में  जो पैठता।

मिलतीं  सीप अपार, पड़ा  रहे  जो तीर पर।।


शुभमस्तु,

30.04.2026 ◆ 10.15 आ०मा०

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