सोमवार, 27 अप्रैल 2026

सुकाम्यता [त्रिभंगी छंद]

 142/2026


          

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


प्रभु जी दुख हरना,देर न करना,भूलें मेरी,क्षमा करें।

मैं शरण तुम्हारी,नित बलिहारी,जपता मन में,पीर हरें।


प्रभु अन्तर्यामी,जीव सकामी,नाम जपूँ मैं,नित्य शिवम्।

जड़-चेतन व्यापी,घोर उपाधी,घिरा हुआ है,नित्य शुभम्।।


सबका हित करना,संकट हरना,कर्मानुसार,फल देते।

अग-जग के दृष्टा,सबके सृष्टा,सब है संभव,चल जेते।।


सरिता नित बहती,कुछ-कुछ कहती,रुकना न कभी,गति जीवन।

रुकना ही मरना,निज पथ चलना, ये स्वप्न भंग,है छीजन।।


जो जिएं देश को,नहीं वेश को,देशभक्त वे,कहलाते।

सीमा के रक्षक,हुए न तक्षक,वे हतभागी,बन जाते।।


शुभमस्तु,


22.04.2026◆10.45 आ०मा०

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