142/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
प्रभु जी दुख हरना,देर न करना,भूलें मेरी,क्षमा करें।
मैं शरण तुम्हारी,नित बलिहारी,जपता मन में,पीर हरें।
प्रभु अन्तर्यामी,जीव सकामी,नाम जपूँ मैं,नित्य शिवम्।
जड़-चेतन व्यापी,घोर उपाधी,घिरा हुआ है,नित्य शुभम्।।
सबका हित करना,संकट हरना,कर्मानुसार,फल देते।
अग-जग के दृष्टा,सबके सृष्टा,सब है संभव,चल जेते।।
सरिता नित बहती,कुछ-कुछ कहती,रुकना न कभी,गति जीवन।
रुकना ही मरना,निज पथ चलना, ये स्वप्न भंग,है छीजन।।
जो जिएं देश को,नहीं वेश को,देशभक्त वे,कहलाते।
सीमा के रक्षक,हुए न तक्षक,वे हतभागी,बन जाते।।
शुभमस्तु,
22.04.2026◆10.45 आ०मा०
◆◆◆
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें