125/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सबको अपने लगें दुलारे।
माँ को एकचक्षु सुत प्यारे।।
होता नहीं बुरा - अच्छा कुछ,
बस निजत्व ने पाँव पसारे।
लैला न थी सुंदरी नारी,
पर मजनू की दृग की तारे।
इस मन को भा जाए जो भी,
दिखते उसे वहीं उजियारे।
देख अजनबी भौंकें कूकर,
बनें पालतू टरें न टारे।
अपनेपन का मोल बड़ा है,
अनभाए सब लगते खारे।
'शुभम्' श्याम से प्रीति लगा ले,
खुलें प्रेम से बंद किवारे।
शुभमस्तु,
06.04.2026◆7.15 आ०मा०
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