127/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सुहृद सुखद संदेश को, रखें हृदय में धार।
जीवन के भवितव्य का,शुभकर सत उपहार।।
स्वजनों के संदेश में, है उपकारी भाव।
पार उतारें धार से, मित्र तुम्हारी नाव।।
युग-युग से देते रहे, साधु-संत संदेश।
परहित में जीना सभी, रहकर देश-विदेश।।
मात-पिता देते सदा , संतति को संदेश।
चुरा न जी श्रम से कभी,भीत न हो लवलेश।।
पौराणिक संदेश में, मानवता का सार।
छिपा हुआ सर्वत्र ही, उनमें जन उपकार।।
ग्रहण करें संदेश तो , सकल सृष्टि भंडार।
सीख मिले हर व्यक्ति को,शुभतम पर उपकार।।
झुकते हैं तरु भार से,जब लदते बहु बौर।
मानव हित संदेश है, करना मन में गौर।।
कलकल से अपनी यही,देती सरि संदेश।
चरैवेति के गान से, मानव धरे सुवेश।।
वन पाखी कलरव करें,होता सुखद विहान।
फैलाएं संदेश वे, रहे न तम का भान।।
चींटी हार न मानती, गिरती - चढ़ती खूब।
देती श्रम - संदेश जो, नहीं जानती ऊब।।
जैसा जिसका कर्म है,वैसा ही फल लाभ।
शुभद यही संदेश है,सन्निविष्ट उस गाभ।।
शुभमस्तु,
09.04.2026◆5.30आ०मा०
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