सोमवार, 11 नवंबर 2019

गीतिका




सरिता में जो जल  बहता है।
हर  कोई  निर्मल  कहता है।।

मानव   करता   दूषित  गंगा,
फिर भी  गंगा जल कहता है।

नित्य   बनाता    नए   बहाने,
जब पूछो तब कल कहता है।

समझाने  से   नहीं   सुधरता,
खल मानव तो खल रहता है।

'शुभम'वही जाता मंज़िल पर,
चलने का मन - बल रहता है।

💐 शुभमस्तु !
✍रचयिता ©
🍀 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

10.11.2019 ◆12.30 अपराह्न।

पायल की रुनझुन [ गीत ]

         

 पायल  की रुनझुन की अपनी बोली है।
कानों  में मधुरस की प्याली घोली है।।

कोयल  की  फिर कूक उठी है  बागों में।
उसकी मोहक तान बिखरती 
रागों में।।
भौंरों के हित सुमनों ने झोली खोली है।
पायल की रुनझुन की अपनी बोली है।।

प्रकृति पुरुष के आकर्षण में 
बंध जाती।
फैला दोनों बाँह अंक में मदमाती।।
गालों पर मल रही अरुणता
रोली है।
पायल की रुनझुन की अपनी
बोली है।।

सरिता सागर से मिलने को जाती है।
सजनी सजकर  साजन से इतराती है।।
ये न समझ लेना ये सजनी भोली है।
पायल की रुनझुन की अपनी
बोली है।।

नाच उठे बागों में मोर शोर करते।
डाली-डाली पर आम्र- बौर मौर धरते।।
किसलय कलियों ने कोमल चोली खोली है।
पायल की रुनझुन की अपनी
बोली है।।

देह - देह को चाह  रही मौनी भाषा।
नर - नारी के मन की  गहरी परिभाषा।।
विनत नयन युग नज़रें कैसी डोली हैं।
पायल की रुनझुन की अपनी 
बोली है।।

💐 शुभमस्तु  !
✍रचयिता ©
🌷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

05.11.2019■7.45 अपराह्न।

शिशिरागमन [अतुकान्तिका ]

          

कार्तिक की पूर्णिमा
पूर्णता शरद की,
अगहन का आगमन
शिशिर का
पहला चरण,
आर्द्रतामय वातावरण,
धूपाभिषेक की शरण।

शीत ऋतु का
द्वितीय चरण ,
शनैः शनैः 
उष्णता का हरण,
कर रहे 
दूल्हा -दुल्हन
परस्पर  वरण,
निशा की दीर्घता का
आचरण।

बदल रहे
तन के आवरण
शीत अवरोध में 
व्यस्त जन -जन,
 ऊर्ण के
 कृत्रिम वसन,
ढँकते 
सबका तन,
अमीर गरीब की
सामर्थ्य का क्षण।

कभी कोहरा
बरसता तुहिन,
ओस से लदा
दूब का 
द्रुम लताओं का 
पल्लव -पल्लव।
रबी में
उगते गोधूम 
चणक यव 
विविध अन्न,
आ चुका
 घर में
परिपक्व धान्य।

ठिठुरते 
शीत से
जन -जन
पशु -धन,
पखेरु -गण,
निकल कर 
नीड़ से
करते हैं
धूप -सेवन,
शीत ऋतु में
प्रकृति का 
प्रसन्न कण -कण
'शुभम 'प्रतिक्षण।

💐 शुभमस्तु !
✍रचयिता ©
🔆 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम

06.11.2019 ◆8.15 अपराह्न।

मंगलवार, 5 नवंबर 2019

न दिया न दिया सब लोग कहें [ सवैया ]



अपने -   अपने  सिग   लोग कहें,
अपनों न दिखौ सिगरे जग माहीं।
 सिग  स्वारथ   लागि  जुहार करें,
बस पेड़  ही  देत हैं शीतल छाँहीं।।
दीनन        कों   न  दया  मिलती,
रीरिआय         रहे  फैलावत बाँहीं।
बहुतेरे    '  शुभम '    टेरे    परखे,
 सिग हाथ  हिलाय रहे करि नाहीं।।1।

सुख  में  सब प्यार  सों  बात करें,
दुख  में  कोऊ आँखिंन हेरत नाहीं।
भूख     में     बूझै    नहीं  भोजन,
भलें  भूखौ  मरै  कोऊ पथ राही।।
पईसा    ही  खिंचि  रह्यौ पईसा,
पईसा  की  ही   है  रही  है वा'वाही।
कैसें        'शुभम'   परतीति   करें,
   मुख देखि के बोलत लोग सदा ही।।2।

सौर     भलें      फटि   जाय   नई, 
परि     पांय      पसारि    रहे  लंबे।
घर   भाँग   हूँ   भूजी    नाहिं हती,
नित    बोल   बखानि    रहे लंबे।।
शान   कौ    मान    घटै   न  कहूँ,
तम्बुआ      बड़े     तानि   रहे लंबे।
देखी    'शुभम'      जगरीति  सदा,
बड़  बोल    बकें    लंबे - लंबे।।3।

चाहत        मान        सबै   अपनों,
परि     देंन   की   सोच नहीं मन में।
जैसें    बोलत    बोल    कुआँ  प खड़े,
तैसी   लौटेगी   बात  जु  कानन में।।
जो     देहुगे      लौटे    वही  छिन में,
यह       राज  छिपौ  जगती कन में।
बात     'शुभम '       सौने-सी   खरी,
चाहें   गाम  रहौ  या रहौ  वन में।।4।

न   दिया  न  दिया  सब लोग कहें
नदिया    देती   दिन  -  रात   हमें।
सोवै   न    कबहुँ  नित  जागत ही,
बोलै    न     कबहुँ   बड़बोल हमें।।
अपने     ढँग    में   अकड़ो  तू  रहै,
तेरी  ऐंठ  -  उमेठ     न  सोहै  हमें।
देखी       'शुभम'     जगरीति  यही,
स्वारथ    प्रीति    न    भावै  हमें।।5।

💐 शुभमस्तु !
✍रचयिता ©
🔆 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम '

04.11.2019 ■5.00 अपराह्न।

शनिवार, 2 नवंबर 2019

मम्मी मुझे न बनना नेता [ बालगीत ]


 ♾★★♾★★♾★★ 

 मम्मी  मुझे  न  बनना  नेता। 
अब    का नेता भी क्या देता।।

पढ़ - लिखकर मैं नाम कमाऊं।
नित   विद्यालय प ढ़ने जाऊँ।।
विद्यालय   तम को  हर  लेता।.
 मम्मी   मुझे   न   बनना  नेता।।

बिना    पढ़े  भी   नेता   होते।
बीज   ज़हर  के  जन में बोते।।
भरते    वह   आँखों  में  रेता। 
मम्मी  मुझे   न बनना  नेता।।

ऊपर    बगला   भीतर  कौवा।
मानव -  तन  में काला हौआ।।
घड़ियाली       आँसू   रो  देता।
मम्मी    मुझे न  बनना  नेता।।

नेता     क्या    सेवा   करते  हैं?
सीमा     पर   सैनिक  मरते हैं।
राष्ट्र - सुरक्षा     सैनिक  देता।
मम्मी   मुझे  न  बनना  नेता।।

साक्षर क्या  मैं  शिक्षित बनकर।
सेवा    करूँ  वतन की जी भर।।
सद  -  मानव     ही  नैया  खेता।
मम्मी    मुझे  न  बनना  नेता।।

💐 शुभमस्तु !
✍रचयिता ©
👨‍🏭 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'

02.11.2019 ◆7.30 अपराह्न।

नेताजी का स्वर्गवास [ व्यंग्य ]



   नारद जी पृथ्वी पर भ्रमण करने के बाद नारायण ! नारायण !! उच्चारण करते हुए विष्णु लोक पधारे ,तो 
उनके हाथ में पंद्रह -बीस पृष्ठों 
का एक पुलिंदा -सा देख भगवान विष्णु ने पूछा -
'अरे ! नारद जी ,यह  तुम्हारे हाथों में क्या है ?'
    नारद जी बोले -'नारायण ! नारायण !! अभी - अभी मैं एशिया महाद्वीप के एक देश भारत से आ रहा हूँ। एक अख़बार विक्रेता से जिज्ञासा वश ये पुलिंदा ले आया । वहाँ
के लोग इसे अख़बार , समाचार पत्र , न्यूज़ पेपर जैसे नामों से संबोधित करते हैं।'
विष्णु भगवान पूछने लगे - 'आपने इसे पढ़ा कि इसमें क्या लिखा है ?'
   'नारायण ! नारायण !! चलते -चलते थोड़ा शीर्षकों
पर  दृष्टिपात किया था। 
सबसे ऊपर के पृष्ठ पर बड़े- बड़े  अक्षरों में लिखा देखा कि वहाँ के किसी राजनेता
मंत्री का स्वर्गवास हो गया है।'
        'ये भारत  के अखबार वाले भी    असम्भव, मिथ्या 
और कपोलकल्पित  समाचार
अपने मन से छाप देते हैं।
भला ये भी कोई बात हुई कि
कोई नेता स्वर्ग में प्रवेश भी 
कर सके ? यह तो सर्वथा झूठ और चापलूसी भरा छद्म समाचार है । नेताओं के पास मात्र  शोषण , अन्याय , झूठ,
कपट , बेईमानी , अत्याचार,
के अतिरिक्त भी कोई काम है?  हत्या , बलात्कार  जैसे जघन्य दुष्कर्म इन्हीं की छाया तले होते हैं । ये स्वयं करते हैं और अपने पालतू गुर्गों से कराते हैं।ये सच्चे अर्थों में इन्हीं के नेता हैं , जननेता नहीं हैं। अपने आतंक और बाहुबल से डरा धमका कर वोट बटोरने की कला में कुशल ये सभी राजनेता कोई भी दूध का धुला नहीं है। जिसके दामन पर कोई
 दाग नहीं,
 वह नेता हो नहीं सकता।
अन्याय और अन्य आय पर 
निर्भर  न हो ,
वह नेता हो नहीं सकता।।'
विष्णु भगवान ने नारद जी को बताया।
     'नारायण ! नारायण !! प्रभुजी आप एकदम सही कहते हैं ।-नारद जी ने समर्थन करते हुए अपना मत व्यक्त किया।

      'केवल  झूठा सम्मान देने
के लिए इन्हें स्वर्गवासी छाप
दिया जाता है।ऐसा तो किसी
बुरे से बुरे नेता के लिए नहीं लिखा या कहा जाता कि 
अमुक नेताजी नरकवासी 
हो गए।  स्वर्गवासी लिखना तो मात्र एक ढर्रा है , लकीर 
पीटना है।अपने जीवन में जितने पाप और दुष्कर्म जितने एक नेता करता है , उतने पाप और दुष्कर्म
डाकू और हत्यारे भी नहीं करते।डाकू और हत्यारे तो प्रायः अपनी जवानी में ही
करते हैं , लेकिन इन्हें साठ के बाद जवानी आती है और मरने तक इसी  प्रकार के दुष्कर्म करते हुए विलासिता औऱ 
मदोन्मत्त हालत में जीवन के आनन्द का सुखोपभोग करते हैं। दुनिया के देखने में ये सर्व
बुद्धिमान  ,गुणवान, कलाकार , ज्ञानी और धर्मावतार दिखाई देते हैं। 
इनकी हालत ठीक वैसी ही है जैसे  विष्ठा पर मख़मल लपेट दी गई हो। इनके पर्दे तो यहाँ हमारे बने हुए नरकों में ही 
हटाये जाते हैं। जब इनके 
कुकर्मों के काले कारनामों से
उन्हें नंगा किया जाता है। दूध
का दूध और पानी का पानी
तो हमारे चित्रगुप्त जी के चिट्ठों में होता है। जहाँ नेता सिर्फ रोता है , चिल्लाता है , बिलखता है। जब उन्हें कुम्भीपाक की आग में झोंका जाता है , तब सोना और पीतल का भेद स्वतः सामने आ जाता है। वह सहज ही
स्वीकारता है कि उसने जो 
कुछ भी किया, गलत ही किया।'
      'बिके हुए चापलूस पत्रकार , अखबारों के मालिक और संपादक , नेताओं के अंधे भक्त सब एक ही थैली के चट्टे -बट्टे हैं। उन्हें इन झूठी खबरों के छापने के पैसे जो मिलते हैं। फिर जो चाहो लिखवा लो इनसे। इसी
का नाम लोकतंत्र है। मूर्खों के द्वारा , मूर्खों के लिए  चलाया जाने वाला तंत्र (जाल) ही मूर्ख तंत्र (लोकतंत्र) है। यदि 
100 मूर्ख एकतरफ मत कर दें तो यहाँ गधे को घोड़ा सिद्ध करते हुए राजा मान लिया जाता है। जिसे ये लोकतंत्र कहते हैं। इस तंत्र में बुद्धि औऱ बुद्धिमानों का कोई 
भी महत्व नहीं है। लकीर के फ़क़ीर बने रहो , सही बात 
मत कहो , जितना भी हो सब सहो । यही सब इस तंत्र की परिभाषा के तत्व हैं। ऊँट का सुई के छेद से निकल जाना संभव है , किन्तु भी नेता का स्वर्ग में प्रवेश सर्वथा असम्भव है । '
         विष्णु भगवान ने एक साँस में सब कुछ कह डाला।
इस  पर नारद जी कहने लगे - 'नारायण ! नारायण !! हे प्रभो ! आज आपने मेरे प्रज्ञा चक्षुओं को खोल दिया है।'
अब मैं सब कुछ जान और समझ गया हूँ। नारायण !
नारायण !!'
और नारद जी पुनः अपनी लोकयात्रा के भ्रमण पर प्रस्थान कर गए।
💐 शुभमस्तु !
✍ लेखक ©
🍎 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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01.11.2019 ●3.35अपराह्न।

नेताजी का खेत [ दोहे ]




नेताजी        का     खेत   है ,
अपना          सारा       देश।
पाँच     बरस   काटें   फसल, 
बदल -  बदल   कर  वेश।।1।

नेताजी         के    खेत   में ,
घुसने        का      अधिकार।
अधिकारी       को   भी  नहीं ,
करते      सब    स्वीकार।।2।

नेताजी      के      खेत    में,
खाए        गाय   न     भैंस।
बने      बिझूका  नित  खड़े,
अंधभक्त      सब    फैंस।।3।

नेताजी     चहुँदिशि     फिरें,
चूहे          भागें             दूर।
बिना   टॉल    बेटिकिट   ही ,
ऐश         करें       भरपूर।।4।

 नेताजी         के     खेत    में ,
' भक्त '      बो     रहे    बीज।
दुर्लभ      उनको   कुछ  नहीं,
सुलभ  सदा   हर   ' चीज '।।5।

नेताजी     के     शीश   पर ,
घरवाली           का     राज।
यही    राज   की     बात  है,
ज्यों       गौरैया     बाज।।6।

बाहर       सब     नेता  कहें ,
घर     में      मूषक     जान।
मंचों        पर      चिंघाड़ते ,
घर     में     बंद   ज़ुबान।।7।

नेताजी     की      पीठ  पर ,
लक्ष्मी        सदा      सवार।
लक्ष्मी     का     वाहन  कहो,
अँधियारे       का     यार।।8।

नेताजी       की     योग्यता ,
पर      मत   करो    सवाल।
अधिकारी   यश     सर कहें ,
डिगरी    की     टकसाल।।9।

नेताजी    की    फ़सल  का,
मौसम      बारह       मास।
अधिकारी      पछता     रहे ,
पढ़े   न    होते  काश।। 10।

वी    आई   पर्सन      सदा,
रहें        रेल     या     जेल।
काला  -  पीला  कुछ  करें,
' शुभम  ' भावना  खेल।।11।

💐 शुभमस्तु !
✍ रचयिता ©
🍊 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
02नवम्बर2019◆4.45 अपराह्न

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...